अब से करीब छब्बीस साल पहले काश्मीर में मेडीकल की एक 23 वर्षीय छात्रा का आतंकवादियों ने अपहरण कर लिया था। उस युवती के पिता ने अपहरण से मात्र पांच दिन पूर्व इस महान भारत देश के अत्यधिक महत्वपूर्ण गृह मंत्रालय का कामकाज सम्हाला था। इस युवती के अपहरण का ड्रामा छ: दिनों तक चला और आखिरकार अपनी जान की कीमत देकर सुरक्षाकर्मियों द्वारा पकडे गए पांच आतंकियों को सरकार ने जेल से रिहा कर दिया। छ: दिनों बाद वह युवती सही सलामत अपने घर लौट आई थी। छब्बीस साल बाद उस युवती के पिता ने काश्मीर के मुख्यमंत्री का पद संभाला और पद संभालने के मात्र एक सप्ताह के भीतर दस लाख के ईनामी आतंकी को जेल से रिहा कर दिया।
कुछ याद आया। वर्ष 1989 की 2 दिसम्बर। विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार में मुफ्ती मोहम्मद सईद ने पद और गोपनीयता की शपथ ली थी और भारतीय संविधान का पालन करने की कसम भी खाई थी। पद ग्रहण करने के मात्र छ: दिनों के भीतर 8 दिसम्बर 1989 को उनकी छोटी पुत्री रुबिया सईद का अपहरण हो गया। देश को कभी पता नहीं चला कि उनकी पुत्री को आतंकियों के कब्जे से निकालने के लिए पुलिस या सैनिक कार्यवाही के बारे में कोई विचार हुआ भी था या नहीं। महज छ: दिनों के भीतर भारत सरकार ने पांच खूंखार आतंकवादियों, जेकेएलएफ का एरिया कमाण्डर शेख अब्दुल्ला हमीद,मकबूल बट का छोटा भाई गुलाम नबी बट,नूर मोहम्मद कलवाल,मुहम्मद अलताफ और जावेद एहमद झरगर को जेल से रिहा कर दिया था। जब ये आतंकी जेल से छूटे अलगाववादियों ने जमकर खुशियां मनाई और इन्हे बाकायदा जुलूस बनाकर जेल से ले जाया गया।
छब्बीस साल बाद वर्ष 2015 में उसी शख्स ने राज्य के मुख्यमंत्री का पद संभालते ही दस लाख के ईनामी आतंकी मसर्रत आलम को रिहा कर दिया। छब्बीस साल पहले मुफ्ती मोहम्मद सईद देश के गृहमंत्री थे और जिन आतंकियों को रिहा किया गया था,वे काश्मीर की जेल में बन्द थे। उस समय राज्य के मुख्यमंत्री फारुख अब्दुल्ला थे। किसी कैदी को रिहा करना मुख्यमंत्री के हाथों में होता है। केन्द्रीय गृह मंत्री सीधे किसी कैदी को जेल से रिहा नहीं कर सकता। रुबिया सईद प्रकरण के कई सालों बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री फारुख अब्दुल्ला ने यह रहस्योद्घाटन किया था कि रुबिया की रिहाई के बदले आतंकियों को छोडने के मामले में उनकी सरकार को बर्खास्त कर देने तक की धमकी दी गई थी। उन्हे कहा गया था कि यदि वे आतंकियों को रिहा नहीं करेंगे तो उनकी सरकार बर्खास्त कर दी जाएगी। इसी तरह पीपल्स पालिटिकल पार्टी पीपीपी के चेयरमेन हिलाल एहमद वार ने अपनी पुस्तक द ग्रेट डिसक्लोजर्स-सीक्रेट्स अनमास्क्ड में भी यह दावा किया था कि रुबिया के अपहरण का पूरा ड्रामा सईद ने अलगाववादियों के साथ मिलकर रचा था,ताकि आतंकियों को रिहा किया जा सके।
रुबिया के अपहरण के मामले में पांच आतंकियों को रिहा किए जाने के बाद काश्मीर में अपहरण और आतंकी वारदातों की बाढ आ गई थी। आतंकियों के हौसले बुलन्द हो गए थे और हजारों निर्दोष व्यक्तियों को अपनी जान गंवानी पडी थी।उस समय देश में विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार थी,जिसे भाजपा ने बाहर से समर्थन दिया था।
छब्बीस सालों के बाद आज केन्द्र में भाजपा की मजबूत सरकार है। जम्मू काश्मीर के विधानसभा चुनाव में भाजपा दूसरी सबसे बडी पार्टी बनकर उभरी है और मुफ्ती मोहम्मद सईद की सरकार में साझेदार है।
जब केन्द्र में अटल जी की एनडीए सरकार थी,अटल जी और भाजपा गठबन्धन धर्म की दुहाई देते रहते थे। भाजपा ने उस समय गठबन्धन धर्म के नाम पर अपने तमाम मुख्यमुद्दों को ताक पर रख दिया था। हांलाकि उस समय मामला देश चलाने का था,इसलिए इसे स्वीकार भी कर लिया गया था। लेकिन अब केन्द्र में भाजपा अपने बलबूते पर सत्ता में है। गठबन्धन धर्म की कोई मजबूरी नहीं है।
लेकिन भाजपा ने काश्मीर के मामले में गठबन्धन की मजबूरी खुद अपने गले में डाली है। गठबन्धन किया भी तो कैसा? भाजपा ने तो अनुच्छेद 370 का मामला फिर से ताक पर रख दिया। लेकिन इसके विपरित अप्रत्यक्ष तौर पर आतंकियों के मददगार मुफ्ती ने ऐसा कुछ नहीं किया। उन्होने तो शुरुआत ही पाकिस्तान और आतंकवादियों को धन्यवाद देकर की। इस एकमात्र बयान से मुफ्ती का असली चेहरा सामने आ चुका था। भाजपा ने कडा रुख अपनाने की बजाय इस बयान से खुद को अलग कर लिया। मुफ्ती को इतने से भी संतोष नहीं हुआ। अब वे दस लाख के ईनामी आतंकी मसर्रत आलम को रिहा कर चुके है।
देश भर के फैले भाजपा के करोडों समर्थकों के लिए यह घटना दिल दहला देने वाली है। भाजपा के समर्थन वाली सरकार आतंकियों को रिहा कर रही है और रिहाई पर आतंकवादी का जुलूस निकाला जा रहा है। अगर इसके बाद भी कश्मीर में भाजपा सरकार चलाते रहने को राजी रहती है,तो यह देश के करोडों राष्ट्रवादी नागरिकों और भाजपा समर्थकों के साथ भाजपा का विश्वासघात होगा।
देश जानता है कि अब गठबन्धन धर्म की दुहाई नहीं दी जा सकती। काश्मीर राज्य की सरकार के लिए राष्ट्रहितों को दांव पर नहीं लगाया जा सकता। स्वयं को राष्ट्रवादी कहने वाली भाजपा के लिए तो यह डूब मरने का मुकाम है। भाजपा समर्थकों को आस बन्धी थी कि कश्मीर में अब भाजपा सत्ता में है तो वहां से निकाले गए पण्डितों और सिखों के अच्छे दिन आएंगे। वे अपने घरों को लौट सकेंगे। कश्मीर समस्या का राष्ट्रवादी शर्तो पर निराकरण होगा और अलगाववादियों को कुचला जाएगा। लेकिन ये सारे सपने इस एक सप्ताह में चूर चूर हो चुके है। देखना यह है कि सत्ता का नशा कितने दिनों तक भाजपा को अपने असर में रखता है? कब तक यह गठबन्धन सरकार चलती है और कितने आतंकी और अलगाववादी इससे लाभान्वित होते है?
जम्मू और कश्मीर का राजनितिक निचोड़।
कलम कभी तलवार की तरह चलती थी, हमें उसी कलम की प्रतीक्षा है जो नाथूराम गोडसे के द्वरा लिखी जाती थी। हमें उसी कलम की प्रतीक्षा है जो वीर सावरकर ने सत्य के लिए लिखा था। आज का समाज और राजनितिक टिक कार कोई न कोई दल से जुड़े हुए है और अपनी लेखनी में कही न कही उस दल विशेस को बढ़ा चढ़ा कर लिखने में कोई कोथाइ नहीं करते।
खैर आइये हम आज जानते है मुफ्ती सरकार के खेल के बारे में?
क्या आपको मालूम है जम्मू-कश्मीर में क्या खेल खेला जा रहा है?
बीजेपी की शिरकत से चल रही मुफ्ती सरकार के सत्ता में आते ही कश्मीर घाटी में भारत विरोधी और पाकिस्तान समर्थक तत्व इतना सक्रिय क्यों हो गए हैं?
मैंने भी बहुत सोचा फिर मुफ़्ती के बारे में कुछ जानने की कोसिस किया आइये आप भी जानिए।
मसर्रत आलम की गिरफ्तारी के बाद कश्मीर घाटी में हिंसक प्रदर्शन शुरू हो गए हैं. पाकिस्तान-समर्थक हुर्रियत नेता सैयद अली शाह गिलानी के स्वागत में रैली आयोजित करने और उसमें पाकिस्तानी झंडे फहराने और पाकिस्तान के समर्थन में नारे लगाए जाने के पीछे उसकी बहुत बड़ी भूमिका थी. पाकिस्तान ने इस घटना की व्याख्या यह कह कर की कि इससे पता चलता है कि कश्मीर की जनता के दिल में उसके लिए कितना प्यार है.
सही बात है जिस देश की धरती में
मेरी जान मेरी जान
पाकिस्तान पकिस्तान के नारे लगे वो मुल्क खुस तो होगा ही। जैसे फिल्मो में मोगममो खुस हुआ।
लेकिन दूसरी तरफ यह भी सवाल उठता है कि हुर्रियत नेताओ के खिलाफ राज्य सरकार उन पर अंकुश लगाने के बजाय उन्हें शह क्यों दिए जा रही है?
क्या उनके ऊपर मकोका नहीं लगाया जा सकता?
क्या भारतीय जनता पार्टी द्वारा व्यक्त किया जा रहा आक्रोश सिर्फ जबानी जमा खर्च नहीं है?
अगर वह केंद्र और राज्य में सत्ता में न होती, तब भी क्या उसकी प्रतिक्रिया ऐसी ही होती?
पिछले कुछ समय की घटनाओं को देखकर किसी के भी मन में ये सवाल पैदा होना स्वाभाविक है और इनकी पृष्ठभूमि में बीजेपी को जम्मू में मिली अभूतपूर्व चुनावी सफलता है जिसके कारण राज्य का राजनीतिक मानचित्र मुस्लिम बहुल कश्मीर और हिन्दू बहुल जम्मू में बंट गया है. क्या इस विभाजन को औपचारिक शक्ल देने की कोशिश तो नहीं की जा रही?
क्या यह सिर्फ एक संयोग है कि इस समय जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री वही मुफ्ती सईद हैं जिनके दिसंबर 1989 में भारत का गृह मंत्री बनते ही आतंकवादियों के उनकी बेटी रूबिया को अगवा कर लिया था और उसकी रिहाई के बदले पांच आतंकवादियों को जेल से रिहा किया गया था. अब ये भी जान लेते है वो पांच आतन्कवादी कौन थे।
जिसमें हामिद शेख, मोहम्मद अल्ताफ बट, शेर खान, जावेद अहमद जरगर और मोहम्मद कलवल था।
इन्हीं मुफ्ती सईद के केन्द्रीय गृह मंत्री रहते हुए कश्मीर घाटी से कश्मीरी पंडितों को खदेड़ा गया था, आतंकवादी गतिविधियां एका एक बढ़ गई थीं और 1990 का पूरा दशक इनकी भेंट चढ़ गया था. कश्मीर को इस्लामी गणतन्त्र घोषित करने वाले पोस्टरों से घाटी को पाट दिया गया था. क्या इतिहास अपने-आप को दुहराने जा रहा है?
मुफ्ती मुहम्मद सईद की मजबूरी यह है कि उन्हें हर हालत में अपने आपको नेशनल कान्फ्रेंस के मुकाबले भारत सरकार के अधिक विरोध में दिखाना है ताकि पाकिस्तान परस्त उग्रवादी और आतंकवादी तत्व खुश रहें. विधानसभा चुनाव की सफलता के लिए पाकिस्तान और हुर्रियत कान्फ्रेंस को धन्यवाद देना, मसर्रत आलम को रिहा करना और गिलानी की रैली आयोजित करने देना और पाकिस्तानी झंडे फहराने के बाद भी काफी समय तक गिरफ्तार करने में हिचकना, ये सभी इसी ओर संकेत करते हैं. सईद का पिछला इतिहास भी आश्वस्त करने वाला नहीं है।
लेकिन भारतीय जनता पार्टी और जम्मू-कश्मीर में उसके पूर्वज संगठनों का इतिहास भी बहुत आश्वस्त नहीं करता. शायद आज बहुत लोगों को यह याद न हो कि जब महाराजा हरी सिंह राज्य को भारत में मिलाने के लिए तैयार नहीं थे, तब राज्य के हिन्दू नेता भी उनका समर्थन कर रहे थे क्योंकि उन्हें यह मंजूर नहीं था कि एक हिन्दू रियासत धर्मनिरपेक्ष भारत का हिस्सा बने. मई 1947 में अखिल जम्मू-कश्मीर राज्य हिन्दू सभा की कार्यकारिणी ने प्रस्ताव पारित करके कहा था कि विलय के सवाल पर वे जो भी फैसला करेंगे, वह उसे मान्य होगा. जब 1953 में संयुक्त राष्ट्र द्वारा भेजे गए मध्यस्थ सर ओवेन डिक्सन ने जम्मू-कश्मीर को एक सुगठित आर्थिक-भौगोलिक-राजनीतिक इकाई न मानते हुए यह सुझाव दिया कि उसके अलग-अलग अंचलों में अलग-अलग जनमत संग्रह कराया जाये और कश्मीर घाटी के बारे में अलग से फैसला लिया जाये, तो भारतीय जनसंघ को यह मंजूर था और उसके उस वक्त के नेता बलराज मधोक ने इस सुझाव का स्वागत किया था. इस समय राजनीतिक रूप से जम्मू और कश्मीर घाटी के बीच का संबंध टूट चुका है. पिछले विधानसभा चुनाव के नतीजों ने जम्मू में बीजेपी का और कश्मीर घाटी में मुफ्ती मुहम्मद सईद की पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी का वर्चस्व स्थापित कर दिया है। ऐसे में राज्य के तीनों अंचलों- जम्मू, कश्मीर और लद्दाख को स्वायत्तता दिये जाने की मांग फिर से जोर पकड़ सकती है. यह तर्क भी फिर से दिया जा सकता है कि पाकिस्तान के प्रभाव को निरस्त करने के लिए ऐसा करना जरूरी है. एक संभावना यह भी है कि मुफ्ती के नर्म रुख के चलते आतंकवादियों और अलगाववादियों का मनोबल बढ़ेगा और पाकिस्तान को अधिक हस्तक्षेप करने का मौका मिलेगा. पाकिस्तान में जब भी नवाज शरीफ सत्ता में आते हैं, कश्मीर में पाकिस्तानी भूमिका भी बढ़ जाती है. भारत के साथ संबंध सुधारने के उनके चुनावी वादे भी चुनावी जुमले ही सिद्ध हो रहे हैं. देश के अंदरूनी हालात की गंभीरता से जनता का ध्यान हटाने के लिए नवाज शरीफ कश्मीर पर ध्यान केन्द्रित कर सकते हैं. यदि ऐसा हुआ तो यह पूरे दक्षिण एशिया क्षेत्र के लिए दुर्भाग्यपूर्ण होगा.
अब एक बार हम सईद की बड़ी बेटी के बारे में भी एक नजर देख लेते है?
महबूबा मुफ्ती से जुड़े कुछ मुख्य विवाद भी हमेशा उनके साथ रहे हैं।
महबूबा मुफ्ती की पार्टी ने कश्मीर का एक नक्शा जारी किया उसमें अक्साई चीन और कराकोरम जैसे लद्दाख के इलाकों को, जिस पर फिलहाल 1962 से चीन ने कब्जा किया हुआ है। बाकायदा चीन के राजकीय लाल रंग से और पाक अधिकृत कश्मीर को पाकिस्तानी झंडे के हरे रंग से दर्शाया गया है।
महबूबा मुफ्ती अकसर घाटी में हिंदू विरोधी भावनाएं भड़काती रहती हैं। चाहे वह कश्मीरी पंडितों का हो या अमरनाथ यात्रा का। अमरनाथ यात्रा का तो वह हर साल विरोध करती हैं। एक बार तो उन्होंने यह तक कह दिया था कि हिंदू यहां आकर गंदगी फैलाते हैं।
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