217 फ़ाइल और 70 हजार पेज में सिमट कर रहा गया है नेताजी का रहस्य। हमें तो ऐसा मेहसूस हो रहा है जितने फ़ाइल और पन्नों में नेताजी का सच छिपा है उतने से कम फ़ाइल और पन्नों में भारतीय राजनितिक लूटेरे का सच सामने आ जाये।
मोदी सरकार बनने के पहले राजनाथ सिंह ने भी एक दाव खेल था और कहा था की हमारी सरकार बनने पे नेता जी का सच सामने आएगा। आज उसी बीजेपी के कुछ नेता कह रहे है की नेताजी का सच सामने आना चाहिये और कुछ लोग कह रहे है की अगर सच सामने आया तो सरकार और देश के ऊपर इसका सीधा असर पड़ेगा।
राजनितिक तथागत टिप्पड़ियों करने वालो को ये सोचना चाहिए की वो चुनाव के पहले क्या वादा करते है और चुनाव के बाद क्या क्या बोल देते है।
क्या देश और इस भारतवासियो को जानने का हक नहीं है की आखिर नेता जी की मिर्तु कैसे हुई?
क्या नेता जी के चाहने वालो और उनके परिवार वालो को जानने का हक नहीं है की नेता जी की रिपोर्ट क्या है ?
भारत छोड़ो आंदोलन तीन महीने में ही कमजोर क्यू पड़ गया क्या ये इतिहास जानने का हक भारतवासियो को नहीं है?
अगर इन सारे सवालो का जवाब आपका भी हाँ में है तो आखिर वो क्या समझोता है, क्या परेसानी है, कैसी बिडम्बना है जो कोई भी सरकार इस बात को उजागर नहीं करती?
क्या ये धोका नहीं है इन महान वीर माँ भारती के लाल सुभाष चंद्र बोष के लिए जो अब इस दुनिया में नहीं है।
आइये कुछ झलक देखते है नेताजी के बारे में जो तीन आयोग ने जाच के द्वारा दिया है।
नेताजी सुभाषचंद्र बोस की मौत का रहस्य एक बार फिर गहरा गया है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को नेताजी सुभाष चंद्र बोस के रूप में चर्चित गुमनामी बाबा की पहचान की जांच के लिए समिति गठित करने पर विचार करने को कहा है।
ऐसे में एक बार फिर ये सवाल उठने लगा है कि क्या फैजाबाद के गुमनामी बाबा उर्फ भगवान जी ही नेताजी सुभाष चंद्र बोस थे? क्या नेता जी की मौत 18 अगस्त, 1945 में विमान दुर्घटना में नहीं हुई थी, जैसा की सरकार दावा करती है।
दरअसल सुभाष चंद्र बोस की मौत से जुड़ा विवाद नया नहीं है। नेताजी की मौत की जांच के लिए गठित मुखर्जी आयोग ने भी गुमनामी बाबा के सुभाष चंद्र बोस होने का संकेत दिया था। लेखक व शोधकर्ता अनुज धर ने भी अपनी किताब में गुमनामी बाबा के नेता जी होने का दावा किया।
बाबा के अनुयायी भी दावा करते हैं कि वे सुभाष चंद्र बोस थे। उनका कहना है कि बाबा अपने छिपने के लिए परिस्थतियों को जिम्मेदार ठहराते थे। उन्होंने कहा था कि उनके सामने आने से भारत को विश्व शक्तियों से प्रतिबंध का सामना करना पड़ सकता है।
मुखर्जी आयोग ने भी किया था इशारा
सुभाष चंद्र बोस की मौत की जांच के लिए कलकत्ता हाईकोर्ट के आदेश पर गठित मुखर्जी आयोग ने विमान हादसे में नेताजी के मौत को खारिज कर दिया था। आयोग ने उनकी गुमशुदगी से जुड़े पांच सिद्धांत सामने रखे थे।
आयोग का पहला सिद्घांत था कि अगस्त 1945 में जापान के तायहीको फारमोसा में दुर्घटना में नेताजी की मौत हुई। दूसरा यह कि अगस्त, 1945 में रेडफ्रोट में उनकी हत्या की गई। तीसरा यह कि साधु का जीवन जीते हुए 1977 में उनकी मृत्यु हुई। चौथा कि वह मध्य प्रदेश शिव पुकलम में मरे। पांचवां यह कि नेताजी की मौत गुमनामी बाबा के रूप में फैजाबाद में हुई।
मुखर्जी आयोग ने जिस गुमनामी बाबा की ओर इशारा किया था वे फैजाबाद के राम भवन में रहते थे। 18 सितंबर, 1985 को उनकी मौत हुई। बताया जाता है कि नेताजी के रिश्तेदार अक्सर उनसे मिलने आते थे। मुखर्जी आयोग ने गुमनामी बाबा से जुड़े सामानों की भी जांच की थी।
अनुज धर ने भी जताई थी संभावना
नेताजी सुभाष चंद्र बोस के गुमनामी बाबा होने की बात लेखक व शोधकर्ता अनुज धर ने भी अपनी किताब 'इंडियाज बेस्ट कवर अप' में कही थी। अनुज ने एक पुरानी तस्वीर पेश करते हुए संभावना जताई कि जिस बाबा का वर्ष 1985 में फैजाबाद में निधन हुआ था, हो सकता है कि वह ‘नेताजी’ हों।
शोधकर्ता अनुज धर ने अपनी किताब ‘इंडियाज बिगेस्ट कवर अप’ में 1969 की अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसी ‘एसोसिएट प्रेस’ की एक तस्वीर दी, जिसमें बोस की तरह दिखने वाले एक व्यक्ति को दिखाया गया था जो अमेरिका के साथ वार्ता के दौरान पेरिस में वियतनामी प्रतिनिधिमंडल के साथ खड़ा था।
किताब में दावा किया गया कि ‘गुमनामी बाबा’ के नाम से प्रसिद्ध ‘भगवान जी’ ने अपने प्रशंसकों से कहा था कि वे वियतनाम और अमेरिका के बीच हुई शांति वार्ता में मौजूद थे। गुमनामी बाबा के पत्र से भी इस बात के संकेत मिलते हैं। धर ने दावा कि यह ‘बाबा’ की तस्वीर हो सकती है और हो सकता है कि वे नेताजी हों। नेताजी के बड़े भाई और नेताजी सुभाष चंद्र बोस जांच समिति के सदस्य सुरेश बोस ने 1972 में अपने निधन से पहले कहा था कि उस समय उनके भाई जीवित थे।
अनुज की किताब में छपी दुर्लभ तस्वीर में नोबेल पुरस्कार विजेता ली दुक थो को अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल के साथ वार्ता के पहले सत्र में वियतनामी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व करते दिखाया गया है। इस तस्वीर में बोस की तरह दिखने वाला दाढ़ी वाला एक व्यक्ति पत्रकारों और वियतनामी प्रतिनिधिमंडल के अधिकारियों के साथ खड़ा है।
धर ने इस व्यक्ति के नेताजी होने की संभावना जताते हुए अपनी पुस्तक में लिखा, उनका ज्यादातर चेहरा मूंछों, दाढ़ी और बड़े फ्रेम वाले चश्मे से ढका है। दक्षिण-पूर्व एशियाई लोगों और राजनयिकों के लिए इस तरह से दाढ़ी रखना असामान्य है। लेखक का दावा है कि बाबा न केवल अपने मेकअप पर ध्यान देते थे बल्कि अपने चेहरे की सज्जा बदलते रहते थे ताकि वह लोगों के ध्यान का केंद्र नहीं बनें।
बाबा खुद के सोवियत संघ जाने और फिर वियतनाम युद्ध में भाग लेने की बात करते थे और लोक हित में छिपने के लिए परिस्थतियों को जिम्मेदार ठहराते थे। नेताजी 17 अगस्त 1945 को बैंकॉक हवाई अड्डे पर अंतिम बार देखे गए थे और इसके बाद से उनके बारे में कोई खबर नहीं है। यह पुस्तक अमेरिका, नेताजी सुभाषचंद्र बोस की मौत का रहस्य एक बार फिर गहरा गया है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को नेताजी सुभाष चंद्र बोस के रूप में चर्चित गुमनामी बाबा की पहचान की जांच के लिए समिति गठित करने पर विचार करने को कहा है।
ऐसे में एक बार फिर ये सवाल उठने लगा है कि क्या फैजाबाद के गुमनामी बाबा उर्फ भगवान जी ही नेताजी है।
सत्य की बलि नहीं दी जा सकती
सख्ती से समाज को नहीं बदला जा सकता।।
सुरसरि के नारो को सुने गौर से
मणि की बातो को कभी दबाया नहीं जा सकता।।
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बहुत बहुत धन्यबाद आपका
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