गुरुवार, 16 जुलाई 2015

मांस नहीं खाना चाहिए

मांस क्यू नहीं खाना चाहिए आज इसके बारे में बताते है। और कहा लिखा है ये भी जानते है।
प्रेम से बोलिये जय जय श्री राधे।

बाह्य अन्धकार को दूर करने के लिये परम दयालु प्रभु ने जिस प्रकार सूर्य का प्रकाश दिया है इसी प्रकार मानव के आन्तरिक अज्ञान रूपी अंधकार को दूर करने के लिये ज्ञानरूप वेदज्योति का प्रकाश किया है । इस बात को सभी एकमत होकर स्वीकार करते हैं कि वेद सब से प्राचीन है । यहां तक कि विदेशी विद्वानों के मतानुसार भी संसार के पुस्तकालय में सब से प्राचीन धार्मिक ग्रन्थ वेद ही माने जाते हैं । वहां लिखा है –

इममूर्णायुं वरुणस्य नाभिं त्वचं पशूनां द्विपदां चतुष्पदाम् ।

त्वष्टुं प्रजानां प्रथम जनित्रमग्ने मा हिंसीः परमे व्योमन् ॥

(यजुर्वेद अ० १२, मन्त्र ४०)

इन ऊन रूपी बालों वाले भेड़, बकरी, ऊंट आदि चौपाये, पक्षी आदि दो पग वालों को मत मार ।

यदि नो गां हमि यद्यश्वं यदि पूरुषम् ।

तं त्वा सीसेन विध्यामो यथा नोऽसो अवीरहा ॥

(अथर्ववेद १।१६।)

यदि हमारी गौ, घोड़े पुरुष का हनन करेगा तो तुझे शीशे की गोली से बेध देंगे, मार देंगे जिससे तू हननकर्त्ता न रहे । अर्थात् पशु, पक्षी आदि प्राणियों के वध करने वाले कसाई को वेद भगवान् गोली से मारने की आज्ञा देता है ।

वेदों में मांस खाने का निषेध इस रूप में किया है । मांस बिना पशुहिंसा के प्राप्त नहीं होता है । अश्व, गौ, अजा (बकरी), अवि (भेड़) आदि नाम लेकर पशुमात्र की हिंसा का निषेध किया है और द्विपद शब्द से पक्षियों के मारने का भी निषेध है ।

पशुओं को पालने की आज्ञा सर्वत्र मिलती है -

पृष्ठ ८
यजमानस्य पशून् पाहि ।१॥१॥ (यजुर्वेद)

यजमान के पशुओं की रक्षा करो ।

मनुस्मृति के प्रमाण पहले दे चुके हैं । मांस न खाने का फल सौ अश्वमेध यज्ञों के समान बताया है ।

वर्षे वर्षेऽश्वमेधेन यो यजेत शतं समाः ।

मांसानि च न खादेद्यस्तयोः पुण्यफलं समम् ॥मनु ५।५३॥

जो सौ वर्ष पर्यन्त प्रतिवर्ष अश्वमेध यज्ञ करता है और जो जीवन भर मांस नहीं खाता है, दोनों को समान फल मिलता है ।

याज्ञवल्क्य स्मृति में लिखा है -

सर्वान् कामानवाप्नोति हयमेधफलं तथा ।

गृहेऽपि निवसन् विप्रो मुनिर्मांसविवर्जनात् ॥

(आचाराध्याय ७।१८०॥)

विद्वान् विप्र सर्वकामनाओं तथा अश्वमेध यज्ञ के फल को प्राप्त होता है । ऐसा गृहस्थी जो मांस नहीं खाता, वह घर पर रहता हुआ भी मुनि कहलाता है ।
पशु, पक्षी, कीट, पतंग आदि जितने भी संसार में प्राणी हैं, सब अपने-अपने स्वभाव भोजन को भली-भांति जानते तथा पहचानते हैं । अपने भोजन को छोड़कर दूसरे पदार्थों को सर्वथा अभक्ष्य समझते हैं, उनको न देखते हैं, न सूंघते हैं । अतः अपने आपको सब प्राणियों में सर्वश्रेष्ठ समझने वाले इस मनुष्य से तो सभी अन्य प्राणी ही अच्छे हैं । जैसे जो पशु घास आदि चारा खाते हैं, वे मांस की ओर देखते भी नहीं और जो मांसाहारी पशु हैं, वे घासफूस की ओर खाने के लिये दृष्टिपात तक नहीं करते । उसी प्रकार कन्दमूल और फलफूल भक्षी प्राणी इन पदार्थों को छोड़कर घास-फूस नहीं खाते । इसी प्रकार पेय पदार्थों की वार्ता है । भयंकर से भयंकर प्यास लगने पर भी कोई पशु मद्य, शराब, सोडावाटर, चाय, काफी और भंग आदि नहीं पीते । परन्तु यह अभिमानी मनुष्य संसार का एक विचित्र प्राणी है, इसको भक्ष्य-अभक्ष्य का कोई विचार नहीं, पेय-अपेय की कोई मर्यादा नहीं । यह खान-पान में सर्वथा उच्छृंखल है, खानपान में इसका कोई नियम नहीं । यह सर्वभक्षी बना हुवा है । पशु, पक्षी, कीट, पतंग आदि सबको चट कर जाता है । इसका उदर (पेट) सभी प्राणियों का कब्रिस्तान बना हुआ है । निरपराध निर्बल प्राणियों को मारकर खाने में इसने न जाने कौन सी वीरता समझ रक्खी है । राष्ट्रीय कवि श्री मैथिलीशरण गुप्त ने अपनी पुस्तक भारत-भारती में इसका अच्छा चित्र खींचा है –

वीरत्व हिंसा में रहा जो मूल उनके लक्ष्य का,

कुछ भी विचार उन्हें नहीं है आज भक्ष्याभक्ष्य का ।

केवल पतंग विहंगमों में, जलचरों में नाव ही,

बस भोजनार्थ चतुष्पदों में चारपाई बच रही ॥
मनु जी महाराज ने तो आठ कसाई लिखे हैं -

अनुमन्ता, विशसिता निहन्ता क्रयविक्रयी ।

संस्कर्ता चोपहर्ता च खादकश्चेति घातकाः ॥५१॥

सम्मति देने वाला, अंग काटने वाला, मारने वाला, खरीदने वाला, बेचने वाला, पकाने वाला, परोसने वाला, खाने वाले - ये सब घातक हैं । अर्थात् मारने वाले आठ कसाई होते हैं । ऐसे हिंसक कसाई अधर्मियों के लोक परलोक दोनों बिगड़ जाते हैं । मनु जी लिखते हैं -

योऽहिंसकानि भूतानि हिनस्त्यात्मसुखेच्छया ।

स जीवंश्च मृत्श्चैव न क्वचित् सुखमेधते ॥

जो अहिंसक निर्दोष प्राणियों को खाने आदि के लिये अपने सुख की इच्छा से मारता है वह इस लोक और परलोक में सुख नहीं पाता । क्योंकि पापी अधर्मी को कभी सुख नहीं मिलता । पाप का ही तो फल दुःख है । हिंसक से बढ़कर पापी कोई नहीं होता । इसलिये अहिंसा परमो धर्मः अहिंसा को परम धर्म कहा है और इसीलिये यमों में अहिंसा का सर्वप्रथम स्थान है ।

नाकृत्वा प्राणिनां हिंसां मांसमुत्पद्यते क्वचित् ।

न च प्राणिवधः स्वर्ग्यस्तस्मान्मांसं विवर्जयेत् ॥

प्राणियों की हिंसा किये बिना मांस उत्पन्न नहीं होता है अर्थात् मांस की प्राप्ति नहीं होती और प्राणियों का वध वा हिंसा स्वर्गकारक नहीं है अर्थात् दुःखदायी है । निरपराध प्राणियों के प्राण लेकर अपने पेट को भरना अथवा अपनी जिह्वा का स्वाद पूर्ण करना घोर अन्याय और महापाप है और पाप का फल दुःख है । सभी महापुरुषों, सन्त-साधु, महात्माओं तथा धार्मिक ग्रन्थों में मांसाहार की निन्दा की है तथा इसे वर्जित तथा निषिद्ध ठहराया है ।
महाभारत में मांस भक्षण निषेध माना गया है।
सुरां मत्स्यान्मधु मांसमासवकृसरौदनम् ।

धूर्तैः प्रवर्तितं ह्येतन्नैतद् वेदेषु कल्पितम् ॥

(शान्तिपर्व २६५।९॥)

सुरा, मछली, मद्य, मांस, आसव, कृसरा आदि खाना धूर्तों ने प्रचलित किया है, वेद में इन पदार्थों के खाने-पीने का विधान नहीं है ।

अहिंसा परमो धर्मः सर्वप्राणभृतां वरः । (आदिपर्व ११।१३)

किसी भी प्राणी को न मारना ही परमधर्म है ।

प्राणिनामवधस्तात सर्वज्यायान्मतो मम ।

अनृतं वा वदेद्वाचं न हिंस्यात्कथं च न ॥

(कर्णपर्व ६९।२३)

मैं प्राणियों को न मारना ही सबसे उत्तम मानता हूँ । झूठ चाहे बोल दे, पर किसी की हिंसा न करे ।

यहाँ अहिंसा को सत्य से बढ़कर माना है । असत्य की अपेक्षा हिंसा से दूसरों को दुःख अधिक होता है क्योंकि सबको जीवन प्रिय है । इसीलिये यह महान् आश्चर्य है कि -

जीवितुं यः स्वयं चेच्छेत् कथं सोऽन्यं प्रघातयेत् ।

यद्यदात्मनि चेच्छेत् तत्परस्यापि चिन्तयेत् ॥

(शान्तिपर्व २५९।२२॥)

जो स्वयं जीने की इच्छा करता है, वह दूसरों को कैसे मारता है । प्राणी जैसा अपने लिये चाहता है, वैसा दूसरों के लिये भी वह चाहे । कोई मनुष्य यह नहीं चाहता कि कोई हिंसक पशु वा मनुष्य मुझे, मेरे बालबच्चों, इष्टमित्रों वा सगे सम्बन्धियों को किसी प्रकार का कष्ट दे वा हानि पहुंचाये अथवा प्राण ले लेवे, वा इनका मांस खाये । एक कसाई जो प्रतिदिन सैंकड़ों वा सहस्रों प्राणियों के गले पर खञ्जर चलाता है, आप उसको एक बहुत छोटी और बारीक सी सूई चुभोयें तो वह इसे कभी भी सहन नहीं करेगा । फिर अन्य प्राणियों की गर्दन काटने का अधिकार उसे कहां से मिल गया ? प्राणियों का हिंसक कसाई महापापी होता है । महाभारत में कहा है -

घातकः खादको वापि तथा यश्चानुमन्यते ।

यावन्ति तस्य रोमाणि तावदु वर्षाणि मञ्जति ॥

(अनुशासनपर्व ६४।४॥)

मारनेवाला, खानेवाला, सम्मति देनेवाला - ये सब उतने वर्ष दुःख में डूबे रहते हैं जितने कि मरने वाले पशु के रोम होते हैं । अर्थात् मांसाहारी घातकादि लोग बहुत जन्मों तक भयंकर दुःखों को भोगते रहते हैं । मनु महाराज के मतानुसार आठ कसाई इस महापातक के बदले दुःख भोगते हैं ।
बौद्ध और जैन मत
ये दोनों ही सम्प्रदाय अहिंसा परमो धर्मः प्राणियों की हिंसा न करने को परमधर्म मानते आये हैं । यथार्थ में इनका मूल सिद्धान्त ही हिंसा न करना है । जैनी तो इसका पालन बहुत कट्टरता और निष्ठापूर्वक आज तक करते चले आ रहे हैं । इसलिये वे मांस को खाना तो दूर रहा, उसका स्पर्श तक नहीं करते । यहां तक कि कितने ही जैनी तो लहसुन, प्याज, शलजम आदि तक का सेवन नहीं करते । इनके जितने भी तीर्थंकर हुये हैं, वे सभी क्रियात्मक रूप से मांसभक्षण के विरोधी थे । इनके सभी ग्रन्थों में मांस भक्षण का निषेध पाया जाता है ।

अनेक बौद्ध ग्रन्थों में भी मांस भक्षण का निषेध पाया जाता है । बौद्धों की अहिंसा से ही प्रभावित होकर महाराजा अशोक ने कलिंग के महायुद्ध में लाखों योद्धाओं को जब अपने आंखों से मरते देखा तो उसने इस बीभत्स दृश्य को देखकर महात्मा बुद्ध की अहिंसा की शिक्षा लेकर युद्ध को लेकर की जाने वाली दिग्विजय का सर्वथा त्याग कर दिया और स्वयं मांस खाना छोड़ दिया और उसकी पाकशाला में प्रतिदिन हजारों पशुओं का वध करके जो मांस पकता था, उसको सर्वथा और सर्वदा के लिये बन्द कर दिया ।

महात्मा बुद्ध के जीवन में भी यह घटना आती है कि उन्होंने एक मेमने का चीत्कार सुनकर अपने समाधि सुख का त्याग कर दिया और महाराजा बिम्बसार के यज्ञ में जो सहस्रों निरपराध पशुवों की बलि दी जा रही थी, वहीं उपदेश करके उसको सर्वथा निषिद्ध कर दिया ।

इससे सिद्ध होता है कि बौद्ध और जैन मत में भी हिंसा को सर्वथा निषिद्ध तथा बहुत बुरा माना गया है ।
मांसाहार पर सन्तों की सम्मति

कबीर सन्तों में मुख्य माने जाते हैं । उनकी कबीर बीजक का यह लेख है -

काजी काज करहु तुम कैसा । घर घर जाह करावहु भैंसा ॥

बकरी मुर्गा किन फरमाया । किसके हुकम तैं छुरी चलाया ॥

दर्द न जाने पीर कहावैं । बैंतां पढ़ पढ़ जग समुझावैं ॥

कह हि कबीर सैयाद कहावैं । आप सरीखे जग कबुलावैं ॥

रमेणी ४९ (साखी दोहा)

दिन को रोजा रखत हो, रात काटत हो गाय ।

यह तो खून वह बेदगी, क्योंकर खुशी खुदाय ॥

तरुक रोजा नमाज गुजारे, बिसमिल बांग पुकारै ।

इनको बहिस्त कैसक होई है, सांझै मुरगी मारै ॥

हिन्दू को दया, मेहर तुरकन की, दूनों घर सो त्यागी ।

ये हलाल वे झटका मारें, आग दोनों घर लागी ॥

भूला रे अहमक नादाना, तुम हरदम रामहिं न जाना ।

बरबस आपजु गाय पछीरन, गला काट जिव आप लिया ।

जियत जीव मुरदार करत है, ताको कहत हलाल किया ॥

जाहि मांस को पाक कहत है, ताकि उत्पत्ति सुन भाई ।

रज वीरज से मांस उपानी, मांस नापाकी तुम खाई ॥

अपनी देख कहत नहीं अहमकु, कहत हमारे बढ़न किया ।

पृष्ठ १७
उसकी खून तुम्हारी गरदन, जिन तुम को उपदेश दिया ।

गयी स्याही आई सफेदी, दिल सफैद अजहुं न हुवा ।

रोजा नमाज बांग न कीजै, हुजरे भीतर बैठ मुवा ॥

धर्म कथै जंहि जीव वधै तहि अधर्म करु मेरे भाई ।

जो तुमरे को ब्राह्मण कहिये वाको कहिये कसाई ॥

तिह नर पापी शठ पहिचानो ।

करत घास जे मांस स्वादहित, न जानत दर्द बिराणो ॥

जीव जनि मारहु वापुरा, सबका एकै प्राण ।

तीरथ गये न बांचि हौ कोटि हीरा दे दान ॥

जीव जनि मारहु वापुरा, बहुत लेत वै कान ।

हत्या कबहु न छुटि है, कोटि न सुनहूँ पुरान ॥
मुसलमानों को उपदेश

हक्क-हक्क करत है हुक्का, तीसों रोजे साबित रक्खा ।

सांझ परी जब मुरगी मारी, उस दरगह में होगी ख्वारी ॥

(बहदे का ग्रन्थ ३१, १०१)

जो दिखावे को तीस रोजे रखता और खुदा परस्त बनता है किन्तु साँझ होने पर मुर्गी मारकर खा जाता है, खुदा की दरगह में उसकी ख्वारी होती है, अर्थात् वह खूब दुःख भोगता है ।

पृष्ठ २१
मुसलमानों को चेतावनी

लुवा, बुटेर, तीतर, हिते हेरिके

खा गये भूनकर मुरग चिड़िया ।

पकड़ हिलवान ततवारे तिके किये,

अजो नर भिसत के भरम पड़िया ॥

(रेखते २०, ११)

तीतर, बटेर, मुरग, चिड़िया आदि निर्दोष पक्षियों को भूनकर खा जाते हैं । इतना अत्याचार करके भी बहिश्त (स्वर्ग) में जाने की इच्छा करते हैं, वे भरम में ही हैं । काम तो दुःख प्राप्ति के और इच्छा स्वर्ग की ।

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