इतिहास बड़ा ही गौरव शाली है खास कर भारत का , आप इसमें जितना ही डूबेंगे उतना ही आपको मजा आएगा, आइये कुछ झलक देखते है और अब जानते हैं चमार एवं खटिक जाति का गौरवशाली इतिहास के बारे में ।
सिकन्दर लोदी (१४८९-१५१७) के शासनकाल से पहले पूरे भारतीय इतिहास में 'चमार' नाम की किसी जाति का उल्लेख नहीं मिलता। आज जिन्हें हम 'चमार' जाति से संबोधित करते हैं और जिनके साथ छूआछूत का व्यवहार करते हैं, दरअसल वह वीर चंवरवंश के क्षत्रिय हैं। जिन्हें सिकन्दर लोदी ने चमार घोषित करके अपमानित करने की चेष्टा की।
भारत के सबसे विश्वसनीय इतिहास लेखकों में से एक विद्वान कर्नल टाड को माना जाता है जिन्होनें अपनी पुस्तक 'द हिस्ट्री आफ राजस्थान' में चंवरवंश के बारे में विस्तार से लिखा है।
प्रख्यात लेखक डॅा विजय सोनकर शास्त्री ने भी गहन शोध के बाद इनके स्वर्णिम अतीत को विस्तार से बताने वाली पुस्तक "हिन्दू चर्ममारी जाति: एक स्वर्णिम गौरवशाली राजवंशीय इतिहास" लिखी। महाभारत के अनुशासन पर्व में भी इस राजवंश का उल्लेख है।
डॉ शास्त्री के अनुसार प्राचीनकाल में न तो चमार कोई शब्द था और न ही इस नाम की कोई जाति ही थी।
'अर्वनाइजेशन' की लेखिका डॉ हमीदा खातून लिखती हैं,
मध्यकालीन इस्लामी शासन से पूर्व भारत में चर्म एवं सफाई कर्म के लिए किसी विशेष जाति का एक भी उल्लेख नहीं मिलता है। हिंदू चमड़े को निषिद्ध व हेय समझते थे। लेकिन भारत में मुस्लिम शासकों के आने के बाद इसके उत्पादन के भारी प्रयास किए गये थे।
डा विजय सोनकर शास्त्री के अनुसार तुर्क आक्रमणकारियों के काल में चंवर राजवंश का शासन भारत के पश्चिमी भाग में था और इसके प्रतापी राजा चंवरसेन थे। इस क्षत्रिय वंश के राज परिवार का वैवाहिक संबंध बाप्पा रावल वंश के साथ था। राणा सांगा व उनकी पत्नी झाली रानी ने चंवरवंश से संबंध रखने वाले संत रैदासजी को अपना गुरु बनाकर उनको मेवाड़ के राजगुरु की उपाधि दी थी और उनसे चित्तौड़ के किले में रहने की प्रार्थना की थी।
संत रविदास चित्तौड़ किले में कई महीने रहे थे। उनके महान व्यक्तित्व एवं उपदेशों से प्रभावित होकर बड़ी संख्या में लोगों ने उन्हें गुरू माना और उनके अनुयायी बने। उसी का परिणाम है आज भी विशेषकर पश्चिम भारत में बड़ी संख्या में रविदासी हैं। राजस्थान में चमार जाति का बर्ताव आज भी लगभग राजपूतों जैसा ही है। औरतें लम्बा घूंघट रखती हैं आदमी ज़्यादातर मूंछे और पगड़ी रखते हैं।
संत रविदास की प्रसिद्धी इतनी बढ़ने लगी कि इस्लामिक शासन घबड़ा गया सिकन्दर लोदी ने मुल्ला सदना फकीर को संत रविदास को मुसलमान बनाने के लिए भेजा वह जानता था की यदि रविदास इस्लाम स्वीकार लेते हैं तो भारत में बहुत बड़ी संख्या में इस्लाम मतावलंबी हो जायेगे लेकिन उसकी सोच धरी की धरी रह गयी स्वयं मुल्ला सदना फकीर शास्त्रार्थ में पराजित हो कोई उत्तर न दे सका और उनकी भक्ति से प्रभावित होकर अपना नाम रामदास रखकर उनका भक्त वैष्णव (हिन्दू) हो गया। दोनों संत मिलकर हिन्दू धर्म के प्रचार में लग गए जिसके फलस्वरूप सिकंदर लोदी आगबबूला हो उठा एवं उसने संत रैदास को कैद कर लिया और इनके अनुयायियों को चमार यानी अछूत चंडाल घोषित कर दिया। उनसे कारावास में खाल खिचवाने, खाल-चमड़ा पीटने, जुती बनाने इत्यादि काम जबरदस्ती कराया गया उन्हें मुसलमान बनाने के लिए बहुत शारीरिक कष्ट दिए। लेकिन उन्होंने कहा -----
''वेद धर्म सबसे बड़ा, अनुपम सच्चा ज्ञान,
फिर मै क्यों छोडू इसे, पढ़ लू झूठ कुरान.
वेद धर्म छोडू नहीं, कोसिस करो हज़ार,
तिल-तिल काटो चाहि, गोदो अंग कटार'' (रैदास रामायण)
संत रैदास पर हो रहे अत्याचारों के प्रतिउत्तर में चंवर वंश के क्षत्रियों ने दिल्ली को घेर लिया। इससे भयभीत हो सिकन्दर लोदी को संत रैदास को छोड़ना पड़ा था।
संत रैदास का यह दोहा देखिए:
बादशाह ने वचन उचारा । मत प्यारा इसलाम हमारा ।।
खंडन करै उसे रविदासा । उसे करौ प्राण कौ नाशा ।।
जब तक राम नाम रट लावे । दाना पानी यह नहींपावे ।।
जब इसलाम धर्म स्वीकारे । मुख से कलमा आपा उचारै ।।
पढे नमाज जभी चितलाई । दाना पानी तब यह पाई ।
समस्या तो यह है कि आपने और हमने संत रविदास के दोहों को ही नहीं पढ़ा, जिसमें उस समय के समाज का चित्रण है जो बादशाह सिकंदर लोदी के अत्याचार, इस्लाम में जबरदस्ती धर्मांतरण और इसका विरोध करने वाले हिंदू ब्राहमणों व क्षत्रियों को निम्न कर्म में धकेलने की ओर संकेत करता है।
चंवरवंश के वीर क्षत्रिय जिन्हें सिकंदर लोदी ने 'चमार' बनाया और हमारे-आपके हिंदू पुरखों ने उन्हें अछूत बना कर इस्लामी बर्बरता का हाथ मजबूत किया।
इस समाज ने पददलित और अपमानित होना स्वीकार किया, लेकिन विधर्मी होना स्वीकार नहीं किया आज भी यह समाज हिन्दू धर्म का आधार बनकर खड़ा है।
अब आइये जानते हैं खटिक जाति के बारे में :-
खटिक जाति मूल रूप से वो ब्राहमण जाति है, जिनका काम आदि काल में याज्ञिक पशु बलि देना होता था। आदि काल में यज्ञ में बकरे की बलि दी जाती थी। संस्कृत में इनके लिए शब्द है, 'खटिटक'।
मध्यकाल में जब क्रूर इस्लामी अक्रांताओं ने हिंदू मंदिरों पर हमला किया तो सबसे पहले खटिक जाति के ब्राहमणों ने ही उनका प्रतिकार किया। राजा व उनकी सेना तो बाद में आती थी। मंदिर परिसर में रहने वाले खटिक ही सर्वप्रथम उनका सामना करते थे। तैमूरलंग को दीपालपुर व अजोधन में खटिक योद्धाओं ने ही रोका था और सिकंदर को भारत में प्रवेश से रोकने वाली सेना में भी सबसे अधिक खटिक जाति के ही योद्धा थे। तैमूर खटिकों के प्रतिरोध से इतना भयाक्रांत हुआ कि उसने सोते हुए हजारों खटिक सैनिकों की हत्या करवा दी और एक लाख सैनिकों के सिर का ढेर लगवाकर उस पर रमजान की तेरहवीं तारीख पर नमाज अदा की। (पढ़िये मेरे पिछले पोस्ट "भारत में इस्लामी आक्रमण एवं धर्मान्तरण का खूनी इतिहास" ४ भागों में)
मध्यकालीन बर्बर दिल्ली सल्तनत में गुलाम, तुर्क, लोदी
वंश और मुगल शासनकाल में जब अत्याचारों की मारी हिंदू जाति मौत या इस्लाम का चुनाव कर रही थी तो खटिक जाति ने अपने धर्म की रक्षा और बहू बेटियों को मुगलों की गंदी नजर से बचाने के लिए अपने घर के आसपास सूअर बांधना शुरू किया।
इस्लाम में सूअर को हराम माना गया है। मुगल तो इसे देखना भी हराम समझते थे। और खटिकों ने मुस्लिम शासकों से बचाव के लिए सूअर पालन शुरू कर दिया। उसे उन्होंने हिंदू के देवता विष्णु के वराह (सूअर) अवतार के रूप में लिया। मुस्लिमों की गो हत्या के जवाब में खटिकों ने सूअर का मांस बेचना शुरू कर दिया और धीरे धीरे यह स्थिति आई कि वह अपने ही हिंदू समाज में पददलित होते चले गए। कल के शूरवीर ब्राहण आज अछूत और दलित श्रेणी में हैं।
1857 की लडाई में मेरठ व उसके आसपास अंग्रेजों के पूरे के पूरे परिवारों को मौत के घाट उतारने वालों में खटिक समाज सबसे आगे था। इससे गुस्साए अंग्रेजों ने 1891 में पूरी खटिक जाति को ही वांटेड और अपराधी जाति घोषित कर दिया।
जब आप मेरठ से लेकर कानपुर तक 1857 के विद्रोह की दासतान पढेंगे तो रोंगटे खडे हो जाए्ंगे। जैसे को तैसा पर चलते हुए खटिक जाति ने न केवल अंग्रेज अधिकारियों, बल्कि उनकी पत्नी बच्चों को इस निर्दयता से मारा कि अंग्रेज थर्रा उठे। क्रांति को कुचलने के बाद अंग्रेजों ने खटिकों के गांव के गांव को सामूहिक रूप से फांसी दे दिया गया और बाद में उन्हें अपराधि जाति घोषित कर समाज के एक कोने में ढकेल दिया।
आजादी से पूर्व जब मोहम्मद अली जिन्ना ने डायरेक्ट
एक्शन की घोषणा की थी तो मुस्लिमों ने कोलकाता शहर
में हिंदुओं का नरसंहार शुरू किया, लेकिन एक दो दिन में ही पासा पलट गया और खटिक जाति ने मुस्लिमों का इतना भयंकर नरसंहार किया कि बंगाल के मुस्लिम लीग के मंत्री ने सार्वजनिक रूप से कहा कि हमसे भूल हो गई। बाद में इसी का बदला मुसलमानों ने बंग्लादेश में स्थित नोआखाली में लिया।
आज हम आप खटिकों को अछूत मानते हैं, क्योंकि हमें
उनका सही इतिहास नहीं बताया गया है, उसे दबा दिया
गया है।
आप यह जान लीजिए कि दलित शब्द का सबसे पहले प्रयोग अंग्रेजों ने 1931 की जनगणना में 'डिप्रेस्ड क्लास' के रूप में किया था। उसे ही बाबा साहब अंबेडकर ने अछूत के स्थान पर दलित शब्द में तब्दील कर दिया। इससे पूर्व पूरे भारतीय इतिहास व साहित्य में 'दलित' शब्द का उल्लेख कहीं नहीं मिलता है।
हमने और आपने मुस्लिमों के डर से अपना धर्म नहीं छोड़ने वाले, हिंसा और सूअर पालन के जरिए इस्लामी आक्रांताओं का कठोर प्रतिकार करने वाले एक शूरवीर ब्राहमण खटिक जाति को आज दलित वर्ग में रखकर अछूत की तरह व्यवहार किया है और आज भी कर रहे हैं।
भारत में 1000 ईस्वी में केवल 1 फीसदी अछूत जाति थी, लेकिन मुगल वंश की समाप्ति होते-होते इनकी संख्या 14 फीसदी हो गई। आखिर कैसे..?
सबसे अधिक इन अनुसूचित जातियों के लोग आज के उत्तरप्रदेश, बिहार, बंगाल, मध्य भारत में है, जहां मुगलों के शासन का सीधा हस्तक्षेप था और जहां सबसे अधिक धर्मांतरण हुआ। आज सबसे अधिक मुस्लिम आबादी भी इन्हीं प्रदेशों में है, जो धर्मांतरित हो गये थे।
डॉ सुब्रहमनियन स्वामी लिखते हैं, '' अनुसूचित जाति
उन्हीं बहादुर ब्राह्मण व क्षत्रियों के वंशज है, जिन्होंने
जाति से बाहर होना स्वीकार किया, लेकिन मुगलों के
जबरन धर्म परिवर्तन को स्वीकार नहीं किया। आज के हिंदू समाज को उनका शुक्रगुजार होना चाहिए, उन्हें कोटिश: प्रणाम करना चाहिए, क्योंकि उन लोगों ने हिंदू के भगवा ध्वज को कभी झुकने नहीं दिया, भले ही स्वयं अपमान व दमन झेला।''
प्रोफेसर शेरिंग ने भी अपनी पुस्तक '
हिंदू कास्ट एंड टाईव्स' में स्पष्ट रूप से लिखा है कि ''
भारत के निम्न जाति के लोग कोई और नहीं, बल्कि
ब्राहमण और क्षत्रिय ही हैं।''
स्टेनले राइस ने अपनी पुस्तक "हिन्दू कस्टम्स एण्ड देयर ओरिजिन्स" में यह भी लिखा है कि अछूत मानी जाने वाली जातियों में प्राय: वे बहादुर जातियां भी हैं, जो मुगलों से हारीं तथा उन्हें अपमानित करने के लिए मुसलमानों ने अपने मनमाने काम करवाए थे।
यदि आज हम बचे हुए हैं तो अपने इन्हीं अनुसूचित जाति के भाईयों के कारण जिन्होंने नीच कर्म करना तो स्वीकार किया, लेकिन इस्लाम को नहीं अपनाया।
आज भारत में 23 करोड़ मुसलमान हैं और लगभग 35 करोड़ अनुसूचित जातियों के लोग हैं। जरा सोचिये इन लोगों ने भी मुगल अत्याचारों के आगे हार मान ली होती और मुसलमान बन गये होते तो आज भारत में मुस्लिम जनसंख्या 50 करोड़ के पार होती और आज भारत एक मुस्लिम राष्ट्र बन चुका होता। यहाँ भी जेहाद का बोलबाला होता और ईराक, सीरिया, सोमालिया, पाकिस्तान और अफगानिस्तान आदि देशों की तरह बम-धमाके, मार-काट और खून-खराबे का माहौल होता। हम हिन्दू या तो मार डाले जाते या फिर धर्मान्तरित कर दिये जाते या फिर हमें काफिर के रूप में अत्यंत ही गलीज जिन्दगी मिलती।
धन्य हैं हमारे ये भाई जिन्होंने पीढ़ी दर पीढ़ी अत्याचार
और अपमान सहकर भी हिन्दुत्व का गौरव बचाये रखा और स्वयं अपमानित और गरीब रहकर भी हर प्रकार से भारतवासियों की सेवा की।
हमारे अनुसूचित जाति के भाइयों को पूरे देश का सलाम
साभार: 1) हिंदू खटिक जाति: एक धर्माभिमानी समाज
की उत्पत्ति, उत्थान एवं पतन का इतिहास, लेखक- डॉ
विजय सोनकर शास्त्री, प्रभात प्रकाशन
2) आजादी से पूर्व कोलकाता में हुए हिंदू मुस्लिम दंगे में
खटिक जाति का जिक्र, पुस्तक 'अप्रतिम नायक:
श्यामाप्रसाद मुखर्जी' में आया है। यह पुस्तक भी प्रभात
प्रकाशन द्वारा प्रकाशित है।
जय बाबा फरसा वाले
सुंदर जानकारी
जवाब देंहटाएंफेसबुक पर शेयर किया
धन्यवाद
ज्ञानवर्धक पोस्ट. इस बारे में मैं भी अभी अनजान था.
जवाब देंहटाएंअच्छा लगा कि आप को लेख पसंद आया
जवाब देंहटाएंबहुत ही महत्वपूर्ण जानकारी हिन्दू समाज के लिए
हटाएंIs bare Me Mai anjaan tha jankari Dene ke liyle dhanyawad.
हटाएंBht badhya jankari, society me iss caste ke logo ko bht heen bhawna se dekha jata h.
जवाब देंहटाएंबिडम्बना है।
हटाएंगंगा जी कैसी विडमबना है.
हटाएंआपने 1857 क्रांति में खटीको का बड़ा योगदान बताया है. जबकि इसमें दादरी कठेडा के राजा उमरावसिंह, धनसिंह कोतवाल और राजा नैन सिंह और उनके बेटे ये सब गुर्जर जाति से थे गाँव गगोल, घाट गाँव और पाचली गाँव और मेरठ के आसपास के गुर्जरों को ढूंढ कर मारा और गाँव घाट, गगोल और पाचली में आग लगा दी और पुरुषों को ढूंढ ढूढ़ कर मारा.ज जो स्त्रिया गाँव छोड़कर दूर अपने मायके चली गई थी.और इन तीनों को बुलन्दशहर में काला आम पर फांसी दे दी थी.
हटाएंAti sundar ATI Sundar Gyan Jo hamen bataen sar Jo hamen jaankar bahut Khushi Hui jai bhim
हटाएंहमारे धरोहर को याद दिलाने के लिए
जवाब देंहटाएंधन्यवाद
बहुत बहुत धन्यबाद
हटाएंVV Good sir g
जवाब देंहटाएंBahot acha information diya aapne, lekin aajkal ki generation ko kuch nahi pata in sab ke baare mein, sabhi heen bhavna se dekhte hain SC/ST castes ko
जवाब देंहटाएंTo aap b jagrukta ko badhaiye sbhi k sath milkar post mariye forward kijiye sb chij ka prakashan hota h iska b kijiye
हटाएंबहुत ही महत्तवपूर्ण जानकारी के लिये धन्यवाद
जवाब देंहटाएंSir valmiki caste k baare mein bhi btaaye
जवाब देंहटाएंRajput cavar vansh,
हटाएंThank you so much for your kind information about such a important topic.
जवाब देंहटाएंThanks for appreciate our cast.
जवाब देंहटाएंSir g us samay to koi bhi shudra hindu nhi tha aur na hi hai tab apne kaise ye kaise kah diye ki ravidas g hindu the aur apne mandiro ka bhi jikra kiya hai ye apko pata bhi hai ki brahman (uresian ) hai aur wo hi mughalo se bhik me mandir banwate the aur unki talwe chat te the sir chawar vansh ka galat history mat dijiye apko ye bhi nhi pata hai ki ham 5000 varso se chhua chhut ki jindagi ji rahe the aur aap shudra ko hi hindu kah diye
जवाब देंहटाएंइस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
हटाएंJai Bhim jai Ravidas
जवाब देंहटाएंVry nice sir ji..
जवाब देंहटाएंअब वक्त आ गया है कि इन्हें भी जनरल के समान माना जाए
जवाब देंहटाएंओर पुराना गौरव वापस दिलगा जाए
इन दलित भाइयों को हिंदू धर्म की मुख्यधारा से जोड़ा जाए अंतर जाति विवाह एवं रोटी बेटी व्यवहार द्वारा
हटाएंतुम्हारा मतलब
हटाएंइस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
हटाएंBilkul tik
हटाएंबढीया
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर तरीके से आपने खटीको को ब्राह्मण घोषित कर दिया लेकिन क्या आपके बाकी भाई भी इस बात को मानेंगे
जवाब देंहटाएंजहर मत घोलो
हटाएंEnhe bhi roti aur beti ka sambadh sthapit karake mukhya dhara me jonia
जवाब देंहटाएंSir apka post bhashan dene ke liye thik hai lekin apke is baat par ko yakin karega ya fir kisi vidhwan ke lekh ya kitab ka likha galat bhi ho sakta hai apke is lekh se varsho purani pratha khatm nahi ho jayega or to manusmriti bhi char jaati me ek jaati inhi ke baare me apna granth me likha hai fir bhi apka ye posh humko kahi na kahi prerna deta hai ki aisa shayad hua hoga na ham satik jante hai na aap lekin ye ishwar ki waani ke saman nishpaksh hai bahut bahut dhanyawad sir jo apne itna badiya post kiya thank you
जवाब देंहटाएंमेरे विचार से ये जानकारी एकतरफ लग रही है ।
जवाब देंहटाएंGalat mat bataw itihas
जवाब देंहटाएंBrahman hai hi nahi us time.
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
हटाएंYes I agree with you, meine jaha tak Sant Ravidass ji ko padha hai unhone Hindu ko support nhi Kiya or na hi kisi dharam ka prachar Kiya hai.
हटाएंJisko yeh post galat lag rah h vo hindu nahi ho
जवाब देंहटाएंsakta
Kirpaya Kar pehele ye bataye ki Hindu ka Matlab Kya hota hai jo is tareeke se aapne bola hai.
हटाएंEsse acha to hota eslam swikar Kar lete kutte hinduo se to Bach jaate.
जवाब देंहटाएंAaj ke jamane me Hindu se badhkar dusra koi darinda dharm nahi
Kutto ki nasle tabaah Kar Deni chahiye. Koyi na bache suar darm aur jhudhe kitabo ke naam par sab ko paresaan Kar ke rkha hai , suar ke bacho ne
जवाब देंहटाएंKya aap sab jaante hai. B. R. Ambedkar kon the. Maharathi karn or Mahatma budha hi krishn bhagwan the
जवाब देंहटाएं.
धन्यवाद
जवाब देंहटाएंहमे भी ये जानकारी नही थी
हमारे भारत केे इन पंनो को जो डालितो की हकीकत है
को बनाय रखा उसके लिये आपको सत सत नमन यदि हमारे देश केे सभी लोगो को जानकारी हो जाये तो अाज हम एक हो सकते है
लेकिन ये कोई नही चाहता
हम तो चमार
जवाब देंहटाएंSbhi bhai or bahno se anurod h ki aap sbhi Dr br. ambedkar ke btaye anusar chale ,gald hi hme saflta milegi.
जवाब देंहटाएंअच्छी जानकारी है - कुछ बदला क्या इससे ? - तुम्हारे ही कुल परिवार ने कुछ किया इनको अपनाने के लिये ???
जवाब देंहटाएंकिसी ने भी क्या किया इनको अपनाने के लिये ???
Jay bhim
जवाब देंहटाएंIss desh ka durbhagya he.... Or kuch dharm ke thekedar jinke karan we log jo kya the or kya bana diye gaye.. Iske bare me sabhi deshwasiya ko kyo nahi bataya jaa raha he.. Jo log achhut nahi the we sabhi aaj kai atyacharo ka samna kar rahe he... Government ko ye sari batain sabhi ke samane rakhni chahiye....
जवाब देंहटाएंcompletely false information...
जवाब देंहटाएंHa to tuu hii BTA de fir shi
हटाएंशब्द संत रविदास जी
जवाब देंहटाएंऊचे मंदर साल रसोई
ऐसी लाल तुझ बिनु कउनु करै
कहा भइओ जउ तनु भइओ छिनु छिनु
कूपु भरिओ जैसे दादिरा कछु देसु बिदेसु न बूझ
खटु करम कुल संजुगतु है हरि भगति हिरदै नाहि
घट अवघट डूगर घणा इकु निरगुणु बैलु हमार
चमरटा गांठि न जनई
चित सिमरनु करउ नैन अविलोकनो
जउ तुम गिरिवर तउ हम मोरा
जउ हम बांधे मोह फास हम प्रेम बधनि तुम बाधे
जब हम होते तब तू नाही अब तूही मै नाही
जल की भीति पवन का थ्मभा रक्त बुंद का गारा
जिह कुल साधु बैसनौ होइ
जे ओहु अठसठि तीर्थ न्हावै
जो दिन आवहि सो दिन जाही
तुझहि सुझंता कछू नाहि
तुम चंदन हम इरंड बापुरे संगि तुमारे बासा
तोही मोही मोही तोही अंतरु कैसा
दारिदु देखि सभ को हसै ऐसी दसा हमारी
दुलभ जनमु पुंन फल पाइओ बिरथा जात अबिबेकै
दूधु त बछरै थनहु बिटारिओ
नागर जनां मेरी जाति बिखिआत चमारं
नाथ कछूअ न जानउ
नामु तेरो आरती मजनु मुरारे
पड़ीऐ गुनीऐ नामु सभु सुनीऐ
बिनु देखे उपजै नही आसा
बेगम पुरा सहर को नाउ
म्रिग मीन भ्रिंग पतंग कुंचर एक दोख बिनास
माटी को पुतरा कैसे नचतु है
मिलत पिआरो प्रान नाथु कवन भगति ते
मेरी संगति पोच सोच दिनु राती
मुकंद मुकंद जपहु संसार
सतजुगि सतु तेता जगी दुआपरि पूजाचार
सह की सार सुहागनि जानै
संत तुझी तनु संगति प्रान
सुख सागर सुरितरु चिंतामनि कामधेन बसि जा के रे
सुख सागरु सुरतर चिंतामनि कामधेनु बसि जा के
हम सरि दीनु दइआलु न तुम सरि
हरि जपत तेऊ जना पदम कवलास पति
हरि हरि हरि हरि हरि हरि हरे
डॉ विजय सोनकर शास्त्री जी थोड़ी जानकारी मुझसे भी ले लो टाइम्स ऑफ इंडिया के अखबार में सन 2003 मैं एक DNA पर आधारित रिपोर्ट प्रकाशित हुआ था जिसमें साफ-साफ बताया गया है कि भारत में रहने वाले एसटी एससी ओबीसी और माइनॉरिटी का डीएनए एक है और यह डीएनए भारत में पिछले 60000 साल से पाया जाता है और जितने भी अपर कास्ट स्वर्ण जाति के लोगों का डीएनए यूरेशियन लोगों से मिलता है जो कि रशिया और यूरोप के बीच में काला सागर के आसपास के लोगों को यूरेशियन कहा जाता है उनसे मिलता है और यह DNA भारत में तीन हजार साल से ज्यादा पुराना नहीं है इसका साफ-साफ मतलब यह है कि भारत में रहने वाले 3 परसेंट ब्राह्मण 5 परसेंट क्षत्रिय और 7 परसेंट वैश्य
जवाब देंहटाएंसही बात है।
हटाएंएक बार भीमराव सकपाल को पढ़ लेना। उसने लिखा है शुद्र आर्य थे और आर्य विदेशी नहीं थे। जय शहीदों उधम सिंह।
हटाएंइस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
जवाब देंहटाएंमाफ करना ब्राह्मण 10 परसेंट नहीं सिर्फ तीन परसेंट है अगर यकीन ना हो तो जातिगत जनगणना करवा लें
हटाएंMukesh: Do you have that TOI report...?
हटाएंplz, email me at buddhashakyavedic@gmail.com
plz, do share with me...!
हम तो भारत के मूलनिवासी है, हम अनार्य है और हम इस देश के शासक है तुम आर्य विदेशी हो, अल्पसंख्यक हो कृपया हमको तुमसे मत जोड़ो...... क्योंकि हम तिलक, तराजू और तलवार को हरामी और ढोंगी समझते है
जवाब देंहटाएंतुम मूलनिवासी और जिन मुल्लों के तुम चूतड़ चाट रहे हो वे भी मूलनिवासी।
हटाएंशानदार जानकारी
जवाब देंहटाएंआभार आपका
हटाएंसही बात है,पर आज हिन्दू धर्म मे ही तो एकता नही है, छुआछूत सबसे ज़्यादा है, और वो भी उच्च वर्ग के निम्न वर्ग से करते हैं, जबकि आपके आनुसार sc st ही पहले के क्षत्रिय और ब्राह्मण हैं, फ़िर ये बात आज के सवर्ण क्यों नही समझ पा रहे हैं, और इन्हे कैसे समझाया जा सकता है?
जवाब देंहटाएंEverything is not true in this post
जवाब देंहटाएंBahut Sundar
जवाब देंहटाएंI don't think it is a complete true history...
जवाब देंहटाएंIt was brahman Manusmriti which categorized human in different caste...
Ravidas born in a sikha family in Banaras which was a low class family...
मनु क्षत्रिय थे।
हटाएंडॉ विजय सोनकर शास्त्री जी थोड़ी जानकारी मुझसे भी ले लो टाइम्स ऑफ इंडिया के अखबार में सन 2003 मैं एक DNA पर आधारित रिपोर्ट प्रकाशित हुआ था जिसमें साफ-साफ बताया गया है कि भारत में रहने वाले एसटी एससी ओबीसी और माइनॉरिटी का डीएनए एक है और यह डीएनए भारत में पिछले 60000 साल से पाया जाता है और जितने भी अपर कास्ट स्वर्ण जाति के लोगों का डीएनए यूरेशियन लोगों से मिलता है जो कि रशिया और यूरोप के बीच में काला सागर के आसपास के लोगों को यूरेशियन कहा जाता है उनसे मिलता है और यह DNA भारत में तीन हजार साल से ज्यादा पुराना नहीं है इसका साफ-साफ मतलब यह है कि भारत में रहने वाले 3 परसेंट ब्राह्मण 5 परसेंट क्षत्रिय और 7 परसेंट वैश्य
जवाब देंहटाएंमुकेश कुमार मोर्य ; Do you have that TOI report...?
जवाब देंहटाएंplease, email me at buddhashakyavedic@gmail.com
please, do share with me...!
Thank you sir information ke liye
जवाब देंहटाएंकिन शब्दों से आपका आभार प्रकट करू।
जवाब देंहटाएंमें आपको नमन करता हूं। आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।
हाँ ये सही है मानते है ,लेकिन हम कब तक दलित कहलाएगें ।मुसलिमो से ज्यादा स्वर्णो का आतंक है छुआछुत से।
जवाब देंहटाएंये समाज मे फैल रही बुराइयाँ हम ही खत्म कर सकते है इस के लिए एकता मे रहना होगा और अगर देश के धर्म मे एकता रहेगी तो गारंटी से कह सकता हु देश सबसे मजबूत होगा
हटाएंMain BHI chamar hua to aap BHI mujse chuachut karte hai
जवाब देंहटाएं🙏🙏🙏 धन्यवाद जी आपके द्वारा दी गई जानकारी से और अब हमें अंदर ही अंदर ये बात चिंता मे डाल रही है की इतना धर्म से प्रेम करने वाले चवर वंस के लोगोँ को भारत के इतिहास मे जगह नहीं मिली ऐसा क्यू हुआ हमें 5 से b. A कर रहा हु लेकिन इतिहास की किताबों मे ऐसा देखने को नहीं मिला इसके पीछे का कारण क्या है उसकी जानकारी और दीजिए आपका बहुत धन्यवाद होगा 🙏🙏🙏
जवाब देंहटाएंSir some historians n saocialists are correct in their view when they say dat our Education system is completely wrong regarding Indian History. We hv toght wrong history which only describe mughals n not hindu kings. Most of d facts are just rubbish. So i think we should focus on d real history of India specially about d varn vyavastha . I think thn vl get somewhat correct knowledge about different hindu clans and dynasties. V need to improve our education system. Our education system operated under d political pressure from last 70 yrs. As told by large no of ppl.
हटाएंसाहब आपने जो ईतीहास सामने लायाहै ईसे और जंतातक पोहच्याना जरुरी है
जवाब देंहटाएंSahi hai
हटाएंकहानी अच्छी बनायी है।
जवाब देंहटाएंइसके हिसाब से सभी चमार व खटीकों को ब्रहमण घोषित कर दिया जाना चाहिए
tujhe bhi banna h jya chamar ya khatik pad ke akal nahi aye kya
हटाएंAchi jankari h .
जवाब देंहटाएंअच्छी लगी जानकारी।
जवाब देंहटाएंI love you admin for this information ❤️
जवाब देंहटाएंLove u too
हटाएंसोनकर जी बहुत जानकारी मिलीं, मेरठ 1857 की क्रांति में धनसिंह कोतवाल ग्राम पाचली मेरठ, राजा उमरावसिंह दादरी गौतमबुद्ध नगर और राजा नैन सिंह और उनके पुत्र परीक्षतगढ मेरठ, गगोल के गुर्जरो, ये सब गुर्जर थें. अंग्रेज़ों ने इनके गाँवो में आग लगा दी थी घाट, पाचली, गगोल के गुर्जर ढुढ़ ढूंढ कर मारे और धनसिंह कोतवाल, राजा नैन सिंह और उसके पुत्र को तथा राजा उमरावसिंह दादरी को बुलन्दशहर के काला आम पर फांसी लगा दी थी.
जवाब देंहटाएंसोनकर जी कुछ इतिहासकारो ने गुर्जरों का इतिहास छिपाने का काम किया था
हिन्दू सभी भाई है उनमें कोई जातियां नही थी सिर्फ कर्म थे उसमे चाहे ब्राह्मण हो या और कोई,जो जैसा कर्म करेगा वैसा ही रहेगा,कोई भी जाति का हो पूजा करेगा तो वह पंडित हो कहलायेगा और यदि कोई ब्राह्मण पूजा पाद नही करेगा तो वह पंडित नही कहलाता है
जवाब देंहटाएंBahot hin accha aap ise aur failaye taki log jane iske bare me
जवाब देंहटाएंSunder jankari aap ko bahut bahut Shamed,
जवाब देंहटाएंJai bhim jay ravidas g
जवाब देंहटाएंयही हे सत्यता,, रामराज्य मैं ऐसा कुछ भी नहीं था सभी समान थे
जवाब देंहटाएंचमार=चंवर वशी राजा क्षत्रिय
जवाब देंहटाएंखटिक=बलि चढाने वाला ब्राह्मण
लडाई लडने वालों को अछूत बना दिया |
🙏जय भीम जय रविदासजी🌹
चमार=चंवर वंशी राजा क्षत्रिय
जवाब देंहटाएंखटिक=बलि चढाने वाला ब्राह्मण
इन लडाई लडने वालों को अछूत बना दिया |
🙏जय भीम जय रविदासजी🌹
चंवरवंशी क्षत्रिय चेतना परिषद से जुड़ने के लिए संपर्क करें 9056145919
हटाएंबहुत-बहुत धन्यवाद इस जानकारी को देने के लिए अभी तक इसी से कोई रूबरू नहीं था सिर्फ पाखंडवाद और मनुवाद के पैदल ए दबा हुआ था।
जवाब देंहटाएंचमार क्षत्रिय है ब्राह्मणों ने केवल भटकाने की कोशिश की इस को समझाने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद।
जवाब देंहटाएंJay go kshyatriy chamar
जवाब देंहटाएंFek new
जवाब देंहटाएंजय भीम जय रविदास जी
जवाब देंहटाएंNice sir
जवाब देंहटाएंजय जय
जवाब देंहटाएं