रविवार, 5 अप्रैल 2015

ब्रह्मा जी

पूर्वकाल में ब्रह्मा जी ने अनेक जल
जन्तु बनाये और उनसे समुद्र के जल
की रक्षा करने के लिये कहा। तब उन
जन्तुओं में से कुछ बोले कि हम इसका रक्षण
(रक्षा) करेंगे और कुछ ने कहा कि हम
इसका यक्षण (पूजा) करेंगे। इस पर
ब्रह्माजी ने कहा कि जो रक्षण
करेगा वह राक्षस कहलायेगा और जो यक्षण
करेगा वह यक्ष कहलायेगा। इस प्रकार वे
दो जातियों में बँट गये। राक्षसों में हेति और प्रहेति
दो भाई थे। प्रहेति तपस्या करने चला गया, परन्तु
हेति ने भया से विवाह किया जिससे उसके
विद्युत्केश नामक पुत्र उत्पन्न हुआ।
विद्युत्केश के सुकेश नामक
पराक्रमी पुत्र हुआ। सुकेश के
माल्यवान , सुमाली और माली
नामक तीन पुत्र हुये।
तीनों ने
ब्रह्मा जी की तपस्या कर
के यह वरदान प्राप्त कर लिये कि हम
लोगों का प्रेम अटूट हो और हमें कोई पराजित न
कर सके। वर पाकर वे निर्भय हो गये और सुरों,
असुरों को सताने लगे। उन्होंने विश्वकर्मा से एक
अत्यन्त सुन्दर नगर बनाने के लिये कहा। इस पर
विश्वकर्मा ने उन्हें लंका
पुरी का पता बताकर भेज दिया। वहाँ वे
बड़े आनन्द के साथ रहने लगे। माल्यवान के
वज्रमुष्टि , विरूपाक्ष, दुर्मुख , सुप्तघ्न , यज्ञकोप,
मत्त और उन्मत्त नामक सात पुत्र हुये।
सुमाली के प्रहस्त्र , अकम्पन,
विकट , कालिकामुख , धूम्राक्ष , दण्ड, सुपार्श्व,
संह्नादि , प्रधस एवं भारकर्ण नाम के दस पुत्र
हुये। माली के अनल , अनिल , हर और
सम्पाती नामक चार पुत्र हुये। ये सब
बलवान और दुष्ट प्रकृति होने के कारण ऋषि-
मुनियों को कष्ट दिया करते थे। उनके कष्टों से
दुःखी होकर ऋषि-मुनिगण जब भगवान
विष्णु की शरण में गये तो उन्होंने
आश्वासन दिया कि हे ऋषियों! मैं इन
दुष्टों का अवश्य ही नाश करूँगा।
जब राक्षसों को विष्णु के इस आश्वासन
की सूचना मिली तो वे सब
मन्त्रणा करके संगठित हो माली के
सेनापतित्व में इन्द्रलोक पर आक्रमण करने के
लिये चल पड़े। समाचार पाकर भगवान विष्णु ने
अपने अस्त्र-शस्त्र संभाले और
राक्षसों का संहार करने लगे।
सेनापति माली सहित बहुत से राक्षस
मारे गये और शेष लंका की ओर भाग
गये। जब भागते हुये
राक्षसों का भी नारायण संहार करने लगे
तो माल्यवान क्रुद्ध होकर युद्धभूमि में लौट पड़ा।
भगवान विष्णु के हाथों अन्त में वह
भी काल का ग्रास बना। शेष बचे हुये
राक्षस सुमाली के नेतृत्व में
लंका को त्यागकर पाताल में जा बसे और लंका पर
कुबेर का राज्य स्थापित हुआ। राक्षसों के विनाश से
दुःखी होकर सुमाली ने
अपनी पुत्री
कैकसी से कहा कि पुत्री!
राक्षस वंश के कल्याण के लिये मैं चाहता हूँ
कि तुम परम पराक्रमी महर्षि
विश्वश्रवा के पास जाकर उनसे पुत्र प्राप्त करो।
वही पुत्र हम
राक्षसों की देवताओं से रक्षा कर
सकता है।
पिता की आज्ञा पाकर
कैकसी विश्रवा के पास गई। उस समय
भयंकर आँधी चल
रही थी। आकाश में मेघ
गरज रहे थे। कैकसी का अभिप्राय
जानकर विश्रवा ने कहा कि भद्रे! तुम इस
कुबेला में आई हो। मैं
तुम्हारी इच्छा तो पूरी कर
दूँगा परन्तु इससे तुम्हारी सन्तान दुष्ट
स्वभाव वाली और
क्रूरकर्मा होगी।
मुनि की बात सुनकर
कैकसी उनके चरणों में गिर
पड़ी और
बोली कि भगवन्! आप
ब्रह्मवादी महात्मा हैं। आपसे मैं
ऐसी दुराचारी सन्तान पाने
की आशा नहीं करत
ी। अतः आप मुझ पर कृपा करें।
कैकसी के वचन सुनकर मुनि विश्रवा ने
कहा कि अच्छा तो तुम्हारा सबसे छोटा पुत्र
सदाचारी और धर्मात्मा होगा।
इस प्रकार कैकसी के दस मुख वाले
पुत्र का जन्म हुआ जिसका नाम
दशग्रीव (रावण) रखा गया। उसके
पश्चात् कुम्भकर्ण , शूर्पणखा और
विभीषण के जन्म हुये।
दशग्रीव और कुम्भकर्ण अत्यन्त
दुष्ट थे, किन्तु विभीषण
धर्मात्मा प्रकृति का था। अपने भाई वैश्रवण से
भी अधिक पराक्रमी और
शक्तिशाली बनने के लिये
दशग्रीव ने अपने भाइयों सहित
ब्रह्माजी की तपस्या क
ी। ब्रह्मा के प्रसन्न होने पर
दशग्रीव ने माँगा कि मैं गरुड़, नाग,
यक्ष, दैत्य , दानव , राक्षस तथा देवताओं के लिये
अवध्य हो जाऊँ। रावण ने 'मनुष्य' से इसलिये
नही कहा क्यों के वो मनुष्य
को कमजोर तथा बलरहित समझता था|
ब्रह्मा जी ने 'तथास्तु' कहकर
उसकी इच्छा पूरी कर
दी। विभीषण ने धर्म में
अविचल मति का और क्योकि कुम्भकर्ण
की इच्छा इन्द्रलोक को पाने
की थी इस वजह् से
भयभीरत इन्द्र ने
माँ सरस्वती को कहा कि जब
कुम्भकर्ण वरदान मांग रहा हो तब आप
उसका ध्यान विचलित करे और कुम्भकर्ण इन्द्र
की जगह निन्द्रा बोला जिससे वह ६
माह सोता था और ६ माह जगता था।
जय भारत जय सनातन

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