भारत क्या है?
क्या एक देश?
क्या एक सभ्यता?
क्या एक संस्कृति?
कैसा है यह देश,
कैसी है यहाँ की सभ्यता,
कैसी है यहाँ की संस्कृति?
कभी जरूरत नहीं पड़ी हमें जानने समझने की , की हम लंबे अरसे तक जानते ही न थे कि हम किस देश में रहते हैं, फिर जानना शुरू किया तो विदेशियों के नजरिए से खुद को देखा, और तथागत गलत जाना। जब ज्ञान की पराकाष्ठा का बोध हुआ तो हमने अपने नजरिए से तलाशने शुरू किए और अपने बारे में ढेरों गलतफहमियां गढ़ लीं। परिणाम यह हुआ कि — एक पराजित हीनताबोध और एक मिथ्या श्रेष्ठता ग्रंथि के तहत आज हम इस देश को जानते हैं। इसमें अपने अस्तित्व के बारे में हम या तो उदासीन हैं, या आज भी औपनिवेशिक मानसिकता से ग्रस्त हैं या फिर अतीत के महान युगों के अहंकार में डूबे..
भारत के इतिहास में गांठें पड़ गई हैं। इन्हें खोलना होगा, इसलिए नहीं कि इससे देश का कुछ बनना-बिगड़ना है, इससे हमारा ही सब-कुछ बनना-बिगड़ना है। क्योंकि हम ही देश हैं। भारत को देखने के मोटे तौर पर कई नजरिए हैं —
1.
अभिजातवर्गीय नजरिया, जो सोचता है कि अंग्रेजों ने इसे एक देश बनाया, प्रशासनिक ढांचा दिया।
2.
मध्यवर्गीय मुस्लिम चेतना में विभाजन ने एक फांक डाली, जिससे वह इस देश पर कई सदी के मुस्लिम शासन को अपने अतीत से जोड़ता है।
3.
मध्यवर्गीय हिंदू चेतना जो हजार साल पहले मध्यकालीन युद्धों में पराजित हुए हिंदू शासकों की पराजय के प्रतिशोध की मानसिकता से जुड़ती है।
4.
मध्यवर्गीय शहरी जन जिनकी नजर में शहरी विकास और इस वर्ग की आर्थिक प्रगति के बाहर देश है ही नहीं।
5.
फिर एक प्रगतिशील नजरिया है, जो उपरोक्त दृष्टिकोणों की न सही समझ रखता है, न ही सही व्यावहारिक काट।
कुल मिलाकर यही भारत है आज।
चलिए हम शुरुआत यहां से करते हैं — यदि भारत में अंग्रेज न आए होते तो और दो सौ वर्षो तक भारत ब्रिटिश आधिपत्य में न रहा होता तो इस देश का क्या क्या नुकसान होता?
1.
यह देश एक प्रशासनिक इकाई नहीं बन पाता,
2.
देश में न्याय का शासन न स्थापित हो पाता,
3.
देश में आधुनिक शिक्षा का आरंभ नहीं होता,
4.
देश में विज्ञान की प्रगति नहीं होती,
5.
देश में रेलवे लाइनें, डाक व संचार की आधुनिक व्यवस्थाएं नहीं बन पातीं,
6.
अंग्रेजी शिक्षा से देश वंचित रह जाता,
7.
देश में कुप्रथाएं और रूढ़ियां — सती प्रथा, बाल विवाह, विधवा विवाह आदि खत्म न हो पातीं.. ये कुछ बड़े-बड़े कारण हैं, छोटे कारणों की लंबी श्रंखलाएं प्रस्तुत की जा सकती हैं।
पर एक सवाल उठता है — क्या दुनिया के जिन हिस्सों में अंग्रेज नहीं गए या किन्हीं अन्य शक्तियों का विदेशी शासन कायम नहीं हुआ, वे देश रूढ़ि और पिछड़ेपन में घिरे रहे?
वहां आधुनिक शिक्षा और ज्ञान-विज्ञान नहीं पहुंच सके? सभ्यताओं से जुड़े असत्यों को सत्य के रूप में स्थापित किए जाने में बड़ी सुविधा होती है। सत्ता का पूरा एक तंत्र होता है, उसके होने को और उस होने में शामिल सभी तरह के दोषों को भी एक औचित्य प्रदान कर देता है।
भारत क्या है?
इसे जानने के लिए इस बात के सामने खड़ा होना पड़ेगा कि भारत क्या था?
भारत की संभावनाएं क्या थीं?
विदेशी शासन ने इसे क्या बना दिया?
और आज भी यह इतिहास के किन मकड़जालों में उलझा हुआ है?
हम आज भी औपनिवेशिक लोग हैं?
जैसा कि दावा किया जाता रहा कि भारत में अंग्रेजों ने ज्ञान-विज्ञान, आधुनिक शिक्षा, प्रगति आदि चीजें कीं। ब्रिटिश राज्य के तमाम दोषों के बावजूद हम आज एक राष्ट्र हैं और ज्ञान विज्ञान और आधुनिक शिक्षा और प्रगति हमें सुदृढ़ बनाती है। यह बात सच नहीं है। ये चीजें भारत में हुईं, परंतु देश के स्तर पर नहीं, एक बहुत छोटे से वर्ग के स्तर पर, और आज भी सच्चाई यही है। पहले यह वर्ग ब्रिटिश साम्राज्यवाद का चाकर था, तो आज यह उस पतनशील के भी अनेक स्तरों का निर्माण करता है, जिसके सारे सूत्र अमेरिकी आर्थिक साम्राज्यवाद से जुड़ते हैं।
भारत क्या है?
यह जानने के लिए यह जान लेना जरूरी है कि ब्रिटिश सत्ता ने यहां जो कुछ सकारात्मक काम किए, उसकी कीमत क्या थी? इस देश की प्रतिभा, आत्मसम्मान, ज्ञान, आत्मनिर्भरता आज तक वापस नहीं लौट सकी है। देश की आर्थिक लूट की भरपाई अब तक नहीं हो पाई है।
हां, यह सच है कि जब अंग्रेज आए तो विघटित मुगल सत्ता वाला यह देश बहुत सारी समस्याओं से घिरा हुआ था। ये समस्याएं सामाजिक थीं, राजनीतिक थीं और सांस्कृतिक भी। परंतु इसी देश में जनता से लेकर शासक तक और आम जन से लेकर बौद्धिकों रचनाकारों तक इन समस्याओं को संज्ञान में लिया जा रहा था। औरंगजेब के शासन काल से लेकर प्लासी के युद्ध तक निस्संदेह एक बहुत बड़ा अंधकार भारत के आकाश पर पसर गया था। ब्रिटिश साम्राज्य, इस पहले से घिरे हुए अंधकार के ऊपर भयावह काली रात का एक और आच्छादन बन गया।
मध्ययुग की अलग-अलग सदियों में यूरोप से लेकर एशिया तक दुनिया के हर भू-भाग में सामंती के पतन ने ऐसी स्थितियां पैदा की थीं, और सभी देश अपनी आत्मशक्ति, संकल्प और मनुष्य की उस शाश्वत इच्छाशक्ति, जो अंतत: इतिहास की भूलों को ठीक करती चलती है, के तहत उन स्थितियों से निकले। भारत अपने इस अंधकार से अपने बल पर निकल सके, ब्रिटिश राज्य ने ऐसी समस्त संभावनाएं खत्म कर दीं। और थोड़ा सा समाज के स्तरों को कुरेद कर जीवन की वास्तविक पड़ताल की जाए तो, आज भी भारत इसी अंधकार को अपने भीतर जी रहा है।
भारत की पतनशील सामंती सत्ता के साथ ब्रिटेन के पतनशील सामंती वर्गो, की संस्था यहां स्थापित हुई। संभव है अंग्रेज भारत न आते तो यहां सदी भर तक गृहयुद्धों का इतिहास रचा जाता, संभव है, रूढ़ियों ने लंबे समय तक जीवन को ग्रस्त रखा होता, संभव है, विज्ञान की आहट सुनना मुश्किल होता.. पर यह याद रखा जाना चाहिए कि
1.
ब्रिटिश राज में भारत ने अकाल, युद्ध, जनसंहार, यूरोपीय युद्धों में भारतीय सैनिकों और
1857 से लेकर 1942 तक स्वातंत्रय वीरों के कत्लेआम, गांवों के गांवों को लाशों में बदल देने और फिर अंत में विभाजन के जरिए 1757 से 1947 तक 10 करोड़ से अधिक लोगों की लाशें देखीं।
2.
इन दो सौ वर्षो में पूंजी का जो दोहन हुआ और भारतीय उद्योग और कृषि की जो तबाही हुई यदि उसका संपूर्ण निवेश भारत में होता तो भारत अपनी सारी रूढ़ियों, कुरीतियों और सामंती जकड़न से निकलने का रास्ता अपने आप बना लेता।
ब्रिटिश राज भारत पर एक ऐसा अभिशाप था, जिसकी छाया से भारतीय मन, भारतीय बौद्धिकता, भारतीय व्यवस्था, आज तक नहीं निकल पाई है — इस ब्रिटिश राज ने भारत में दो ऐसे काम किए हैं जिसकी प्रेतछाया से मुक्त होना सहज नहीं है।
1.
एक ऐसा वर्ग जो अंग्रेजी चेतना से बना है, और उसने अब अपने आपको शासक वर्ग के रूप में पिछले 67 सालों में अधिकाधिक मजबूत किया है।
2.
पहले से मौजूद रूढ़िवादी, जातिवादी सामाजिक संगठन को मजबूती देना, जिससे हर व्यक्ति का मानस और उसके जीवन के सारे क्रिया कलाप बनते हैं।
हम भारतीय अपनी समस्त समस्याओं का समाधान दलगत और स्वागत राजनीति में देखने के आदी हो गए हैं — हालांकि हम यह भी जानते हैं कि इसमें कोई समाधान नहीं है, पर इस बात से हम संतुष्ट भी रहते हैं, कि हमारी सामाजिक स्थितियों पर यह राजनीति कोई ऐसा असर तो डाल नहीं रही है, जिससे हमारे अस्तित्व का संकट खड़ा हो। तो एक तरह से हम भ्रष्ट राजनीति के पोषक समाज बन गए हैं — ऐसा समाज जो यह चाहता है कि राजनीति भ्रष्टाचार से मुक्त हो, पर ऐसे व्यक्ति हम नहीं बन पा रहे हैं, जो यह सोचे कि समाज भ्रष्टाचार से मुक्त हो। यदि हम भ्रष्टाचार की आर्थिक परिभाषाओं से बाहर निकल सकें तो हमें साफ दिखाई पड़ेगा हम एक बहुत विराट सामाजिक भ्रष्टाचार वाले समाज हैं, और हमारे जीवन के हर काम इस भ्रष्टाचार को पुष्ट करते हैं, हम इसके समर्थक हैं।
यह है भारत का असली रूप। इसकी बारीकियां, इसके विवरण, इसकी दास्तानें आपको शहरों, गलियों, मुहल्लों से लेकर गांवों, कस्बों हर जगह मिल जाएंगी।
नया भारत तभी बन सकेगा, जब हम सामाजिक भ्रष्टाचार से खुद को मुक्त कर सकेंगे। अगर यह शब्द ठीक ठीक अर्थ न दे पा रहा हो तो, यह कहने से अर्थ को स्पष्ट होना चाहिए कि भारत की वर्तमान रूढ़ जातिव्यवस्था, धार्मिक रूढ़ियां, विवाह और परिवार का सामंती ढांचा, समाज में हर तरह की असमानता, परजीविता, श्रम विरोध, ज्ञान के नाम पर कूप मंडूकता, पुरातन और पश्चिम दोनों का अंधानुकरण.. कितनी.. कितनी सारी तफसीलें हैं, सामाजिक भ्रष्टाचार की।
भारत को आगे बढ़ना होगा। अभी वह आगे बढ़ने के भ्रम में जी रहा है।
बड़ी बात यह है कि — भारत में बड़ी संभावनाएं हैं। बल्कि सही कहना तो यह होगा कि समूचे विश्व में ठहरे हुए समाज हैं, भारत ही एकमात्र संभावना है, इसलिए नहीं कि वह श्रेष्ठ हिंदू परंपरा का वारिस मुल्क है, बल्कि इसलिए कि
इस धरती पर इतिहास कुछ अलग तरह से गुजरा है। इस इतिहास ने नृजाति की दृष्टि से धरती की सभी नस्लों का एक महान मिश्रण यहां तैयार किया है। इस इतिहास ने ज्ञान और दर्शन के उन समस्त प्रवाहों को यहां उत्पन्न किया है, जो यदि आज सही ढंग से गतिशील हो पाए, पुरानी अधोगति से निकल पाए तो यहां सभ्यता का एक महान पुनर्जागरण भी हो सकता है। इस इतिहास ने भारतीय मन को एक खास गहराई दी है, एक अंत:प्रज्ञा दी है, जिस पर दो हजार साल के रूढ़िवाद और कर्मकांड की जमी राख यदि हट सकी तो विश्व को एक नई रोशनी मिलेगी।
यह होगा कैसे?
यही वास्तविक प्रश्न है। और यह आसान नहीं है, यद्यपि बहुत आसान भी है। इसकी बहुत-सी कार्यनीतियां हो सकती हैं। पर अंदरूनी तौर पर तीन स्पष्ट प्रक्रियाएं होनी चाहिए, जो भारत को रूपांतरित कर देंगी —
1.
प्राचीन भारत ज्ञान, कला, विज्ञान.. का कितना भी बड़ा सर्जन-क्षेत्र क्यों न रहा हो, बाद की सदियों में इनका विकास, पूरी तरह से पश्चिमी संसार में ही हुआ है, लेकिन इतने भर से इसे पश्चिमी ज्ञान कह देना ठीक नहीं होगा। इस ज्ञान के आदि-सूत्र भारत की अतिप्राचीन ज्ञान परंपरा से जुड़ते हैं। इसे इस तरह समझा जाना चाहिए कि मानवता का इतिहास अविभाजित है, यह पश्चिम और पूरब में बंटा नहीं है। हां, यह जरूर हुआ है कि ज्ञान, कला, विज्ञान आदि के विकास का प्राचीन चरण भारत में और प्राचीन पूरबी सभ्यताओं में पूरा हुआ तो उसका आधुनिक चरण पश्चिम में।
भारत पश्चिमी रंग में तो एक सदी से अधिकाधिक रंगता ही जा रहा है, पर जरूरत इस बात की है कि वह दर्शन, कला, समाज, विज्ञान आदि के क्षेत्रों में पश्चिम में पिछली पांच सदियों में जो कुछ श्रेष्ठ हुआ है, उसे इस तरह आत्मसात करे, ग्रहण करे, जैसे कि यह उसका ही अपना है।
2.
भारत ने अपने पुरातन की व्यर्थ हो चुकी बातों को अपने ऊपर लाद रखा है, इस बोझे को एकबारगी उतार फेंकने की जरूरत है — तत्काल और अविलंब। इससे भी बड़ी जरूरत है पुरातन के वास्तविक रूप, जो वास्तव में श्रेष्ठ है और जिसमें वास्तव में संपूर्ण मानवजाति के लिए श्रेष्ठतम है, उसे पुन: आविष्कृत करे, ग्रहण करे, विकसित करे।
3.
उपरोक्त दोनों प्रक्रियाओं के साथ अपने संपूर्ण समाज का पुनर्गठन करने की इच्छाशक्ति और साहस पैदा कर सके।
ये बातें बहुत बड़ी हैं, और बड़ी बातें तभी वास्तविक हो पाती हैं, जब वे अपने समय के व्यक्तियों का — हर मामूली से मामूली और हर खास से खास व्यक्ति का सरोकार बन जाएं, जीवनपथ बन जाएं।
इसीलिए भारत के लिए अनंत संभावनाएं हैं।
पर ये संभावनाएं कर्म मांगती हैं, एक नजरिया मांगती हैं, और सबसे बढ़ कर साहस। भारत आज अनुकरण और मानसिक गुलामी की लीलाभूमि बन गया है और यह सब प्रगति और विकास की शक्ल में है। भारत का भविष्य उसकी मौलिकता में है। बहुत पुराने अतीत में भी उसने पूरी पृथ्वी की मानवजाति और उसके ज्ञान को अपनी धरती पर समेटा था और उसे एक चेहरा दिया था। यही भारत की मौलिकता थी और आज भी यह मौलिकता किसी आसमान से नहीं टपकेगी, उसे फिर से एक बार मानव जाति का श्रेष्ठतम ग्रहण करना होगा, और उसे एक नया चेहरा देना होगा, जिसकी पूरे संसार को जरूरत है। यही नए भारत की मौलिकता होगी।
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