राम और राम।
तुलसी बाबा ने एक चोपाई लिखा है रामचरित मानस में आइये देखते है।
जब-जब होई धरम के हानि....!
बढहिं अधम असुर अमिभानी...!!
तब-तब प्रभु धर विविध शरीरा...!
हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा......!!
अगर भगवान राम विष्णु अवतार थे तो भगवान परशुराम भी विष्णु के अवतार थे. अवतार तो अवतार होता है. उसमें बड़ा छोटा कुछ नहीं होता. लेकिन कालक्रम के लिहाज से परशुराम राम से बड़े हो जाते हैं. परशुराम को सिर्फ ब्राह्मणों का इष्ट, आराध्य या देव बताकर समाज के कुछ स्वार्थी तत्वों ने उनकी गरिमा को कम करने की कोशिश जरूर की है लेकिन अब वक्त आ गया है जब हम परशुराम के पराक्रम को सही अर्थों में जानें और इस महान वीर और अजेय योद्धा को वह सम्मान दें जिसके वे अधिकारी हैं.
आम तौर पर परशुराम को एक क्रोधी और क्षत्रिय संहारक ब्राह्मण के रूप में जाना जाता है लेकिन ऐसा है नहीं. परशुराम ने कभी क्षत्रियों को संहार नहीं किया. उन्होंने क्षत्रिय वंश में उग आई उस खर पतवार को साफ किया जिससे क्षत्रिय वंश की साख खत्म होती जा रही थी. लेकिन दुर्भाग्य देखिए कि हम भगवान परशुराम को क्षत्रिय संहारक के रूप में चिन्हित करते हैं. अगर वे क्षत्रिय संहारक होते तो भला एक क्षत्रियकुल वंशी के हाथ में अपना फरसा क्यों सौंप देते? जिस दिन भगवान परशुराम को योग्य क्षत्रियकुलभूषण प्राप्त हो गया उन्होंने स्वत: अपना समस्त राम के हाथ में सौंप दिया.
बहुत कम लोगों को मालूम है कि वे न्याय के लिए हमेशा युद्ध करते रहे, कभी भी अन्याय को बर्दाश्त नहीं किया. न्याय के प्रति उनका समर्पण इतना अधिक था कि उन्होंने हमेशा अन्यायी को खुद ही दण्डित भी किया. अपने माता पिता के लिए असीमित श्रद्धा रखने वाले भगवान परशुराम ने पिता का अपमान करने वाले अपन युग के सबसे बड़े वीर सहस्त्रबाहु को भी मौत के घाट उतार दिया उसकी सेना को समाप्त कर दिया और तब तक उसके वंश का सर्वनाश करते रहे जब तक कि उनके पूज्य पिता ने उनको मना नहीं कर दिया और पश्चात्ताप करने को नहीं कहा भगवान परशुराम के क्षत्रिय कुल विनाशक के रूप में तो बार बार चर्चा होती है लेकिन बहुत कम लोगों को मालूम है कि इस धरती के महान से महान वीरों को उनकी औकात बताकर भगवान परशुराम ने तपस्या का रास्ता अपना लिया था. उनको क्षत्रियों के दुश्मन के रूप में प्रस्तुत करना गलत है. अगर ऐसा होता तो वे भगवान राम को पूजनीय क्यों मानते. वास्तव में उनको किसी भी आततायी के दुश्मन के रूप में प्रस्तुत किया जाना चाहिए. यह संयोग ही था कि हैहय का राजा अर्जुन क्षत्रिय था. अगर उनके पिता की कामधेनु गाय को छीनने वाला कोई ब्राह्मण भी होता तो उसका भी वही हाल होता जो सहस्त्रबाहु का हुआ था.
हुआ यह था कि एक दिन हैहय का राजा अर्जुन भगवान परशुराम के पिता जमदग्नि ऋषि के आश्रम पर जा पहुँचा। उसी आश्रम में कामधेनु भी रहती थी. अर्जुन इतना महान योद्धा था कि उसके बारे में कहते थे कि वह एक हज़ार भुजाओं वाला था. यानी वह हज़ार लोगों के बराबर ताक़तवर था. शक्ति के अहंकार में उसने जमदग्नि ऋषि की शान में गुस्ताखी कर दी. उसने महर्षि से पूछे बिना कामधेनु को साथ ले लिया. उसको अंदाज़ नहीं था कि इस ऋषि का सबसे छोटा पुत्र सारे इतिहास का सबसे वीर पुरुष था. बहरहाल जब भगवान परशुराम वापस लौटे तो पता चला कि कोई अहंकारी राजा कामधेनु को छीन ले गया है. बस क्या था. एक महान योद्धा की ताक़त का अंदाज़ उसी के बाद दुनिया को लगा. भगवान परशुराम ने अपना फरसा और धनुष बाण उठाया और चल पड़े. हैहयनरेश सहस्त्रबाहु अर्जुन अभी अपने नगर में प्रवेश कर ही रहा था कि उसने देखा परशुरामजी महाराज उसी की ओर झपटे आ रहे हैं.उनके हाथ में धनुष-बाण और फरसा था. मौके की नज़ाक़त भांप कर राजा अर्जुन ने सत्रह अक्षौहिणी सेना भेजकर परशुराम को ख़त्म करने का आदेश दिया. भगवान परशुराम ने अकेले ही उस सेना को नष्ट कर दिया. हैहयाधिपति अर्जुन ने जब देखा कि अपनी सेना की हार के बाद खुद ही मोर्चा संभाला .उसने एक साथ ही अपनी हज़ार भुजाओं से पाँच सौ धनुषों पर बाण चढ़ाये और परशुरामजी पर छोड़े.लेकिन परशुराम ने अपने एक धनुषपर छोड़े हुए बाणों से ही एक साथ सबको काट डाला. उसके बाद वहीं रणभूमि में हैहय के राजा अर्जुन को मार डाला और अपने पिता जी की गाय कामधेनु वापस लाये.
कामधेनु की वापसी के लिए हुए युद्ध की बात जब उनके पिता जमदग्नि जी को पता लगी तो महर्षि को तकलीफ हुई. और उन्होंने कहा कि, बेटा! हम ब्राह्मण हैं. हम वीरता नहीं क्षमा के कारण संसार में पूजनीय हैं. ब्राह्मणों की शोभा क्षमा के द्वारा ही सूर्य की प्रभा के समान चमक उठती है. अपने पिता के सम्मान के लिए कुछ भी कर सकने के लिए हमेशा तैयार रहने वाले भगवान परशुराम ने सर झुका करअपने पिता की बात को सुना और जब महर्षि जमदग्नि ने कहा कि राजा का वध ब्राह्मण की हत्या से भी ज्यादा पाप का काम है तो वे प्रायश्चित के लिए निकल पड़े. इस घटना को दूसरी तरह से भी खुछ ग्रंथों में बताया गया है. बताते हैं कि हैहय के राजा ने जमदग्नि ऋषि की ह्त्या कर दी थी, और भगवान परशुराम को उन्होंने आकाशवाणी के ज़रिये यह बात कही थी .एक अन्य तरीके से भी यह घटना बतायी जाती है. कुछ ग्रंथों में लिखा है कि हैहयराज अर्जुन के सर्वनाश के बाद भी परशुराम ने उनके राज्य की स्त्रियों को कोई नुकसान नहीं पंहुचाया था. गर्भवती रानियों एक जो बच्चे पैदा हुए उन्होंने महर्षि जमदग्नि का वध किया. उसके बाद ही भगवान परशुराम क्रोधित हुए और २१ बार
धरती को क्षत्रियों से खाली करवा लिया. हर बार वे महिलाओं को नहीं मारते थे जिसके कारण गर्भ में मौजूद क्षत्रिय पैदा हो जाते थे. यह कथाएं हैं और तरह तरह से इनका वर्णन किया गया है लेकिन परशुराम से सम्बंधित हर कथा का स्थायी भाव यह है कि वे महान वीर थे, सबसे बड़े योद्धा थे और पिता की आज्ञा को सर्वोपरि समझते थे. भगवान परशुराम के चरित्र का सबसे बड़ा पक्ष यह है कि उन्होंने क्षमा करने की परम्परा को एक सार्थक अर्थ दिया. ब्रह्मा के युग से माना जाता है कि ब्राह्मण को क्षमा करनी चाहिए. बहुत सारे लोग ऐसे मिल जायेगें जो यह बताएगें कि ब्राह्मण के पास ताक़त नहीं होती इसलिए वह क्षमा करने के लिए मजबूर होता है लेकिन भगवान परशुराम का चरित्र हमें यह बताता है कि क्षमा करने वाला ब्राह्मण मजबूर नहीं, वास्तव में अपार शक्तिशाली होता है.
भगवान परशुराम के जीवन का यह भाग पुराणेतिहास में बाकायदा लिखा हुआ है लेकिन बाद की दुनिया में उन्हें एक वर्ग के ही महापुरुष के रूप में पेश करने की कोशिश की जाती रही है. विष्णु के अवतार तो वे हैं ही, परशुराम हमारे इतिहास के एक ऐसे महापुरुष हैं जिनकी याद हमेशा न्याय के पक्षधर के रूप में की जानी चाहिए. राम चरित मानस में शंकरजी के धनुष के टूटने के बाद भगवान परशुराम के जिस गुस्से का वर्णन है, उसका तो खूब प्रचार किया जाता है लेकिन विष्णु के अवतार, राम के साथ भगवान परशुराम के अन्य संबंधों का कहीं उल्लेख नहीं किया जाता. राम कथा में बताया गया है कि भगवान रामचन्द्र ने जब शिव का धनुष तोड़ दिया तो परशुराम बहुत ही नाराज़ हुए लेकिन जब उन्हें पता चला कि रामचन्द्र विष्णु के अवतार हैं तो उन्होंने राम की वंदना भी की. तुलसीदास ने बताया है कि उन्होंने जय जय रघुकुल केतू कहा और तपस्या के लिए वन गमन किया .
भगवान परशुराम की याद एक ऐसे महान वीर और तपस्वी के रूप में की जानी चाहिए जो कभी भी गलत काम को बर्दाश्त नहीं कर सकता था. उनकी न्यायप्रियता किसी प्रमाण की मोहताज नहीं है. जहां कहीं भी अन्याय होता था, भगवान परशुराम उसके खिलाफ हर तरह से संघर्ष करते थे और खुद ही दंड देते थे. हैहय के नरेश सहस्त्रबाहु अर्जुन की सेना के नाश और उसके वध को इसी न्यायप्रियता के सन्दर्भ में देखा जाना चाहिए. आज जब चारों तरफ हमारी प्राचीन मनीषा और परम्पराओं के नाम पर हर तरह की हेराफेरी हो रही है, मीडिया का इस्तेमाल करके बाबा पैदा हो रहे हैं, ऐसी हालत में ज़रूरी है कि भगवान परशुराम के चरित्र का चारों तरफ प्रचार हो और नई पीढियां जान सकें कि हमारा इतिहास कितना गौरवशाली रहा है और अपने समय का सबसे वीर योद्धा जो सत्रह अक्षौहिणी सेना को बात बात में हरा सकता था, अपने पिता की आकाशवाणी में हुई आज्ञा को मानकर तप करने चला जाता है. बताते हैं कि यह तपस्या उन्होंने उस जगह पर की थी जहां से ब्रह्मपुत्र नदी भारत में प्रवेश करती है. वहां परशुराम कुंड बना हुआ है. यहीं तपस्या करके उन्होंने शिवजी से फरसा प्राप्त किया था. बाद में इसी जगह पर उसे विसर्जित भी किया.
परशुराम से सम्बंधित बहुत सारे स्थान देश भर में मिल जाते हैं. ज़रुरत इस बात की है कि उन स्थानों को पर्यटन के स्थल के रूप में विकसित किया जाए और भगवान परशुराम के चरित्र के मुख्य पहलुओं के बारे में सारी दुनिया को अवगत कराया जाये.
और अंत में तुलसी बाबा के साथ साथ मेरी अपनी भी चौपाई सुन लीजिये।
जब जब होइ धर्म की हानि।
फलिहे फुलिहे राजनीती महारानी।।
कहवु सुरसरि जोरि जुग् पानी।।
बचिहि इनसे जग अभिमानी।V
जय हो बाबा फरसा वाले
जय बाबा भोले नाथ
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Navya Sree N, Pocket FM
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