आइये एक नजर में देखते है आज का दिन क्यू और कैसे महत्व्पूर्ण है। आज संस्कृत दिवस है।आधुनिक विद्वानों के अनुसार संस्कृत भाषा का अखंड प्रवाह पाँच सहस्र वर्षों से बहता चला आ रहा है।
संस्कृत देवभाषा है। यह सभी भाषाओँ की जननी है। विश्व की समस्त भाषाएँ इसी के गर्भ से उद्भूत हुई है। वेदों की रचना इसी भाषा में होने के कारण इसे वैदिक भाषा भी कहते हैं। संस्कृत भाषा का प्रथम काव्य-ग्रन्थ ऋग्वेद को माना जाता है। ऋग्वेद को आदिग्रन्थ भी कहा जाता है। किसी भी भाषा के उद्भव के बाद इतनी दिव्या एवं अलौकिक कृति का सृजन कहीं दृष्टिगोचर नहीं होता है।ऋग्वेद की ऋचाओं में संस्कृत भाषा का लालित्य, व्याकरण, व्याकरण, छंद, सौंदर्य, अलंकर अद्भुत एवं आश्चर्यजनक है। दिव्य ज्ञान का यह विश्वकोश संस्कृत की समृद्धि का परिणाम है। यह भाषा अपनी दिव्य एवं दैवीय विशेषताओं के कारण आज भही उतनी ही प्रासंगिक एवं जीवंत है।
संस्कृत भाषा के विकासस्तरों की दृष्टि से अनेक विद्वानों ने अनेक रूप से इसका ऐतिहासिक कालविभाजन किया है। जो इस प्रकार है।
(1) आदिकाल (वेदसंहिताओं और वाङ्मय का काल - ई. पू. 4500 से 800 ई. पू. तक)
(2) मध्यकाल (ई. पू. 800 से 800 ई. तक जिसमें शास्त्रों दर्शनसूत्रों, वेदांग ग्रंथों, काव्यों तथा कुछ प्रमुख साहित्यशास्त्रीय ग्रंथों का निर्माण हुआ)
(3) परवर्तीकाल (800 ई. से लेकर 1600 ई. या अब तक का आधुनिक काल)
इस युग में काव्य, नाटक, साहित्यशास्त्र, तंत्रशास्त्र, शिल्पशास्त्र आदि के ग्रंथों की रचना के साथ-साथ मूल ग्रंथों की व्याख्यात्मक, कृतियों की महत्वपूर्ण सर्जना हुई। भाष्य, टीका, विवरण, व्याख्यान आदि के रूप में जिन सहस्रों ग्रंथों का निर्माण हुआ उनमें अनेक भाष्य और टीकाओं की प्रतिष्ठा, मान्यता और प्रसिद्धि मूलग्रंथों से भी कहीं-कहीं अधिक हुई।
प्रामाणिकता के विचार से इस भाषा का सर्वप्राचीन उपलब्ध व्याकरण पाणिनि की अष्टाध्यायी है। कम से कम 600 ई. पू. का यह ग्रंथ आज भी समस्त विश्व में अतुलनीय व्याकरण है। विश्व का सबसे ताकतवर और सर्व गुण संपन्न देश अमरीका के भाषाशास्त्री संघटनात्मक भाषाविज्ञान की दृष्टि से अष्टाध्यायी को आज भी विश्व का सर्वोत्तम ग्रंथ मानते हैं। जो सबसे बड़ा उदाहरण है आज के समय में हम भारतीयो के लिए।
आइये आज हम नमन करते है पाणिनि जी को जिन्होंने इस देश को एक ख्याति दे दिया।
आइये कुछ और देखते है।
बहुत पहले से उन कदमों की आहट जान लेते हैं,।
तुझे ऐ जिंदगी, हम दूर से पहचान लेते हैं.।।
मेरी नजरें भी ऐसे काफिरों की जान ओ ईमां हैं
निगाहें मिलते ही जो जान और ईमान लेते हैं...
आज ही के दिन 28 अगस्त 1896 को रघुपति सहाय उर्फ फिराक गोरखपुरी का जन्म गोरखपुर में हुआ. वह भारत के एक जाने माने शायर, लेखक और आलोचक रहे हैं. महात्मा गांधी के साथ असहयोग आंदोलन में शामिल होने के लिए उन्होंने प्रशासनिक सेवा से इस्तीफा दे दिया था।
28 अगस्त 1914: आज ही के दिन प्रथम विश्व युद्ध की शुरुआत हुई थी।
28 अगस्त 1916: प्रथम विश्वयुद्व में इटली ने जर्मनी के खिलाफ युद्व की घोषणा की।
और आज का सबसे महत्व्पूर्ण इतिहास।
भारत-पाकिस्तान युद्ध,1965 का गोल्डन जुबली जश्न आज से शुरू हो गया है यह आयोजन 22 सितंबर तक चलेगा. हम भी उन वीर जवानो को नमन करते है जिन्होंने अपने जान की बाजी देकर भारत को एसिया में एक जगह दिया और नासमझ पकिस्तान को सबक।
जय बाबा भोले नाथ
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