शनिवार, 29 अगस्त 2015

रक्षा बन्धन

शुभ रक्षाबंधन !
सर्वप्रथम किसने, किसको व क्यों बांधी राखी?

सर्वप्रथम लक्ष्मी जी ने बालि को राखी बांधी थी। दानबेन्द्र राजा बलि अश्वमेध यज्ञ करा रहे थे,नारायण ने राजा बलि को छलने के लिये वामन अवतार लिया व तीन पग में सब कुछ ले लिया, ततपश्चात उसे भगवान ने पाताल लोक का राज्य रहने के लिये दें दिया।
बालि ने प्रभु की इच्छा को सहर्ष स्वीकार करते हुये कहा- किंतु मेरी भी एक शर्त होगी।
भगवान अपने भक्तो की बात कभी टाल नहीँ सकते।उन्होंने शर्त पूछी।बालि ने कहा ऐसे नहीँ प्रभु आप छलिया हो पहले मुझे त्रिवाचा वचन दें की जो मांगूँगा वो आप दोगे।नारायण ने कहा-' दूँगा दूँगा दूँगा'
जब त्रिबाचा करा लिया तब बलि बोले कि 'मैं जब सोने जाऊँ और जब उठूं तो जिधर भी नजर जाये उधर आपको ही देखूं'
नारायण ठगे से रह गये और बोले इसने तो मुझे पहरेदार बना दिया हैं ये सबकुछ हार के भी जीत गया है,किंतु कर भी क्या सकते थे वचन जो दें चुके थे।इस प्रकार काफी समय बीत गया।
उधर बैकुंठ में नारायण के न आने से लक्ष्मी जी को चिंता होने लगी।तभी वहाँ नारद जी का आगमन हुआ।लक्ष्मी जी ने कहा नारद जी आप तो तीनों लोकों में घूमते हैं क्या नारायण को कहीँ देखा आपने?
नारद जी बोले की पाताल लोक में हैं राजा बलि की पहरेदार बने हुये हैं।सारा सत्य जानकर लक्ष्मी जी ने नारद जी से कहा मुझे आप ही राह दिखाये।
नारद ने लक्ष्मी जी का मार्गदर्शन करते हुये कहा कि कहा आप राजा बलि को अपना भाई बना लो और रक्षा-वचन बाँधों और दक्षिणा में प्रभु को माँग लो, किंतु पहले तिर्बाचा करा लेना कि दक्षिणा में जो मांगूगी वो देंगे।

लक्ष्मी जी सुन्दर स्त्री के भेष में रोते-रोते बालि के पास पहुँची।बलि ने कहा-'देवी क्या कष्ट है,क्यों रो रहीं हैं आप?
लक्ष्मी जी बोली की मेरा कोई भाई नहीँ हैं इसलिए मैं दुखी हूँ बालि बोले की दुखी न हों आप मेरी धरम की बहिन बन जायें,तब लक्ष्मी ने बालि को कलावा बाँधा, तिर्बाचा कराया और बोली मुझे आपका ये पहरेदार चाहिये।
धर्मात्मा व विद्व बालि तुरंत समझ गये।लक्ष्मी जी नारायण को लेकर बैकुंठ लौट गायक।उसी समय से यह रक्षाबन्धन प्रारंभ हुआ।
इसी लिये कलावा बाँधते समय यह मंत्र बोला जाता हैं
"येन बद्धो राजा बलि दानबेन्द्रो महाबला तेन त्वाम प्रपद्यये रक्षे माचल माचल:"
ये मंत्र हैं
रक्षा बन्धन अर्थात बह बन्धन जो हमें सुरक्षा प्रदान करे,सुरक्षा किस से-हमारे आंतरिक और बाहरी शत्रुओं से रोग ऋण से।
परस्पर भाई बहन के प्रति प्रेम और सम्मान की भावना रखे।राखी का मान रखें।

रक्षा बंधन के दिन ब्राह्मणों द्वारा श्रावणी उपाकर्म किए जाने का विधान है। यह क्रिया पवित्र नदी के घाट पर सामूहिक रूप से की जाती है।

जानिए क्या है श्रावणी उपाकर्म-

श्रावणी उपाकर्म के तीन पक्ष है- प्रायश्चित संकल्प, संस्कार और स्वाध्याय।

सर्वप्रथम होता है- प्रायश्चित रूप में हेमाद्रि स्नान संकल्प। गुरु के सान्निध्य में ब्रह्मचारी गाय के दूध, दही, घी, गोबर, गोमूत्र तथा पवित्र कुशा से स्नानकर वर्षभर में जाने-अनजाने में हुए पापकर्मों का प्रायश्चित कर जीवन को सकारात्मकता से भरते हैं। स्नान के बाद ऋषिपूजन, सूर्योपस्थान एवं यज्ञोपवीत पूजन तथा नवीन यज्ञोपवीत धारण करते हैं।

यज्ञोपवीत या जनेऊ आत्म संयम का संस्कार है। आज के दिन जिनका यज्ञोपवित संस्कार हो चुका होता है, वह पुराना यज्ञोपवित उतारकर नया धारण करते हैं और पुराने यज्ञोपवित का पूजन भी करते हैं । इस संस्कार से व्यक्ति का दूसरा जन्म हुआ माना जाता है। इसका अर्थ यह है कि जो व्यक्ति आत्म संयमी है, वही संस्कार से दूसरा जन्म पाता है और द्विज कहलाता है।

उपाकर्म का तीसरा पक्ष स्वाध्याय का है। इसकी शुरुआत सावित्री, ब्रह्मा, श्रद्धा, मेधा, प्रज्ञा, स्मृति, सदसस्पति, अनुमति, छंद और ऋषि को घी की आहुति से होती है। जौ के आटे में दही मिलाकर ऋग्वेद के मंत्रों से आहुतियां दी जाती हैं। इस यज्ञ के बाद वेद-वेदांग का अध्ययन आरंभ होता है।  इस प्रकार वैदिक परंपरा में वैदिक शिक्षा साढ़े पांच या साढ़े छह मास तक चलती है। वर्तमान में श्रावणी पूर्णिमा के दिन ही उपाकर्म और उत्सर्ग दोनों विधान कर दिए जाते हैं। प्रतीक रूप में किया जाने वाला यह विधान हमें स्वाध्याय और सुसंस्कारों के विकास के लिए प्रेरित करता है।

प्रेम से बोलिये मोदक वाले बाबा की जय

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