शुक्रवार, 4 सितंबर 2015

4 सितम्बर का इतिहास

आइये नमन करते है इस महान देशभक्त को, जिनका आज जन्मदिन है। अगर विदेसी धरती पे रहते हुए अपने स्वदेश का गुणगान करने के लिए अगर कोई याद किया जाता है तो वो है दादा भाई ।
देश और समाज की सेवा के लिए समर्पित दादाभाई नौरोजी नरमपंथी नेताओं के तो आदर्श थे ही, लोकमान्य बालगंगाधर तिलक जैसे गरमपंथी नेता भी उन्हे प्रेरणास्त्रोत मानते थे। तिलक ने दादाभाई के साथ रहकर वकालत का व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त किया। एक बार दादाभाई को किसी मुकदमे के संबंध में इंग्लैंड जाना पड़ा, उनके साथ सहायक के रूप में तिलक जी भी गए। दादाभाई मितव्ययिता की दृष्टि से लंदन में न ठहरकर वहां से दूर एक उपनगर में ठहरे। सवेरे जल्दी उठने की उनकी आदत थी। घर का सारा काम वे स्वयं करते थे। एक दिन जब वे घर का काम कर रहे थे तभी तिलक जी की आंख खुल गई। उन्होंने कहा क्या आज नौकर नहीं आया, जो सब काम आपको करना पड़ रहा है? इस पर दादाभाई ने तिलक जी को समझाते हुए कहा, मैं अपना काम स्वयं करता हूं। अपने किसी कार्य के लिए दूसरों पर निर्भर नहीं रहता। सुनकर तिलक जी अभिभूत हो गए।

दादाभाई का स्वदेश प्रेम उन्हें भारत ले आया। उस समय यहां अंग्रेजों की ईस्ट इंडिया कंपनी का राज था। ब्रिटिश सरकार ने अपनी छवि यह बना रखी थी कि वह भारत को तरक़्क़ी के रास्ते पर ले जा रही है, लेकिन दादाभाई नौरोजी ने तथ्यों और आंकड़ों से सिद्ध किया कि अंग्रेजी राज में भारत का बहुत आर्थिक नुकसान हो रहा है। भारत दिन-पर-दिन निर्धन होता जा रहा है। उनकी बातों से लोगों को यह विश्वास हो गया कि भारत को अब स्वतंत्र हो जाना चाहिए। वे पहले भारतीय थे, जिन्होंने कहा कि भारत भारतवासियों का है। उनकी बातों से तिलक, गोखले और गांधीजी जैसे नेता भी प्रभावित हुए।

द ग्रैंड ओल्डमैन आफ इंडिया के नाम से मशहूर दादा भाई नौरोजी ब्रिटिश संसद में चुने जाने वाले पहले एशियाई थे। संसद सदस्य रहते हुए उन्होंने ब्रिटेन में भारत के विरोध को प्रस्तुत किया। उन्होंने भारत की लूट के संबंध में ब्रिटिश संसद में थ्योरी पेश की। इस ड्रेन थ्योरी में भारत से लूटे हुए धन को ब्रिटेन ले जाने का उल्लेख था। कांग्रेस का इतिहास लिखने वाले प्रो. एसआर मेहरोत्रा ने बताया कि नौरोजी अपनी वाक् कला से लोगों को अचंभित करते थे। वह जब ब्रिटिश संसद के लिए सदस्य चुने गए तो उन्होंने संसद में कहा, ‘कि मैं धर्म और जाति से परे एक भारतीय हूं’। वह कहा करते थे कि जब एक शब्द से काम चल जाए तो दो शब्दों का प्रयोग नहीं करना चाहिए। एक लिबरल के रूप में वह 1892 में हाउस आफ कामंस के लिए चुने गये। वे एक कुशल उद्यमी थे। 1939 में पहली बार नौरोजी की जीवनी लिखने वाले आरपी मसानी ने ज़िक्र किया है कि नौरोजी के बारे में 70 हज़ार से अधिक दस्तावेज थे जिनका संग्रह ठीक ढंग से नहीं किया गया।

अब एक नजर आज के इतिहास के बारे में

सन् 1514 फ़्रांस के प्रख्यात शिल्पकार जॉन गोजून का जन्म हुआ। वे फ़्रांस पुनर्जागराण आंदोलन के अग्रिणी लोगों में से थे उन्होंने कई गिरजाघरों का निर्माण किया। गोजून ने पेरिस के लोवेर संग्रहालय के निर्माण में भी योगदान दिया। सन् १५६७ ईसवी में उनका निधन हुआ।

सन् 1797- फ़्रांस की सेना ने राजशाही शासन व्यवस्था के समर्थकों के विरुद्ध विद्रोह करके उनका दमन किया। फ़्रांस की क्रान्ति के आठ साल बाद सरकार और क्रान्ति के नेताओं के अनुचित क्रियाकलापों तथा योरोपीय देशों के साथ युद्ध में कई मोर्चों पर फ्रांस की सेना की पराजय के बाद होने वाले चुनावों में लागों ने राजशाही शासन व्यवस्था के पक्ष में वोट डाले। किंतु क्रान्तिकारी नेताओं के कहने पर सैनिक अधिकारियों ने विद्रोह कर दिया विद्रोहियों में नेपोलियन बोनापार्ट भी शामिल था। नेपोलियन बोनापार्ट के लिए सत्ता हथियाने का अवसर उपलब्ध हुआ।
सन् 1828- फ़्रांस के लेखक और इतिहासकार हीपोलीटन का जन्म हुआ। इतिहसकार के रुप में विख्यात होने से पूर्व उन्होंने साहित्य के क्षेत्र में परिश्रम किया था। सन् १८९३ ईसवी में उनका निधन हो गया।

सन् 1882- अमरीकी अविष्कारक एडीसन ने बिजली का पहला मोटर बनाया। यह तीन सौ हार्स पावर का था। एडिसन ने इस मोटर के सहारे न्यूयार्क नगर में एक कारख़ाना स्थापित किया जो नगर के आधे भाग की विद्युत आपूर्ति करता था। एडिसन ने सन् १८६९ में बल्ब का भी अविष्कार किया।

सन् 1923- लेकहर्स्ट (न्यू जर्सी)में,, पहले अमेरिकी हवाई पोत, यूएसएस शेनंडो ने पहली बार आसमान में उड़ान भरी ।

अब प्रेम से बोलिये जय बाबा भोले नाथ

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