मंगलवार, 15 सितंबर 2015

15 सितम्बर का इतिहास डॉ रामकुमार वर्मा

जिन्दगी यादों का कारवाँ है.खट्टी मीठी भूली बिसरी यादें...क्यूँ ना उन्हें जिन्दा करें अपने प्रिय गीतों, गजलों और कविताओं के माध्यम से! अगर साहित्य और संगीत की धारा में बहने को तैयार हैं आप तो कीजिए अपनी एक शाम मेरे नाम.. ये कड़ी आपको आगे मिलेगी हमारे इसी लेख में पढ़ते रहिये मुशुकुरते रहिये और मेरे साथ बोलते रहिये जय हो बाबा मोदक वाले की।

15 सितम्बर का ऐतिहासिक महत्व को प्रदर्शित करने वाली कुछ प्रमुख घटनाएँ पर आइये एक नजर डालते है। और साथ ही साथ प्रेम से बोलिये जय बाबा फरसा वाले।

1821- निकारागुआ हुंडुरास एलसेल्वाडोर ग्वाटेमाला और कॉस्टारिका जैसे देशों ने स्पेन से अपनी स्वाधीनता की घोषणा की। नेपोलियन बोनापार्ट द्वारा स्पेन पर क़ब्ज़ा किये जाने के बाद इस देश की सरकार व सेना कमज़ोर पड़ गयी और यह देश स्वतंत्र हो गये। इन पांचों देशों ने स्वतंत्रता के पश्चात केंद्रीय अमरीका संघ का गठन किया।

1859- पोलैंड के प्रख्यात नेत्र चिकित्सक साहित्यकार व शब्दकोष विशेषज्ञ डॉक्टर ज़ामेनहोफ़ का जन्म हुआ। उन्हें नेत्र चिकित्सा दक्षता प्राप्त थी। और वे कई भाषाओं में निपुण थे उन्होंने संसार के सभी लोगों के बीच एक संयुक्त भाषा खोजने का प्रयास किया। उनका विचार था कि इस मार्ग से राष्ट्रों को एक दूसरे के समीप लाया जा सकता है। डॉक्टर ज़मेनहोफ़ ने अपने ज्ञान और योरोपीय भाषाओं की जानकारी के आधार पर एक विशेष भाषा बनाई जिसका नाम एस्प्रेन्टो है इसका अर्थ होता है आशा। कोई भी व्यक्ति 28 अक्षर और 16 नियम सीखकर सरलता से इस भाषा में बात कर सकता है। और इसे लिख सकता है।

1894- चीन-जापान प्रथम युद्ध में पियोंगयांग की लड़ाइ में जापान ने चीन को करारी मात दी।

1922- स्मरना अग्नीकांड। संभवतः तुर्की सेना द्वारा 13-15 सितंबर तक लगाए गए इस आग में स्मरना के अधिकांश हिस्से नष्ट हो गए थे। एक अनुमान के अनुसार इसमें एक लाख लोग मारे गए थे।

1931- गांधी-इरविन समझौता।

1951- कम्युनिस्ट चीन ने तिब्बत पर कब्जा कर लिया और दलाइ लामा के मठ में अपने पुजारियों को भेजा।

1959- भारत की राष्ट्रीय प्रसारण सेवा दूरदर्शन की शुरुआत।

1959- रूसी नेता निखिता खुर्सचेव अमेरिका की यात्रा करने वाली सोवियत संघ की पहली नेता बनी।

1971- हरी-भरी और शांति पूर्ण दुनिया के निर्माण के लिए प्रतिबद्ध 'ग्रीन पीस' की स्थापना 12 सदस्यों वाली डॉंट मेक ए वेभ कमिटि द्वारा की गइ।

1991- दक्षिणपूर्वी योरोप में स्थित मेसीडोनिया को योगोस्लाविया से स्वतंत्रा मिली। मेसीडोनिया 15वीं के मध्य में उसमानी सेना के अधिकार में चला गया था और 19वीं शताब्दी के अंत में बुलगारिया से जुड़ गया।

आइये एक नजर में देखते है आज जिन महानुभावो का जन्मदिन हैं:-

1890- मैरी क्लैरिसा ऐगथा मिलर, इंगलैंड की प्रसिद्ध अंगरेजी उपन्यासकार जो बाद में ऐगथा क्रिस्टी के नाम से मशहूर हुईं।

1922- जैकी कूपर, अमेरिकी अभिनेता और निर्देशक।

डॉ॰ सुब्रह्मण्यम् स्वामी (जन्म: 15 सितम्बर 1939 चेन्नई, तमिलनाडु, भारत) जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष रह चुके हैं। वे सांसद के अतिरिक्त 1990-91 में वाणिज्य, विधि एवं न्याय मन्त्री और बाद में अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार आयोग के अध्यक्ष भी रहे। 1994-96 के दौरान विश्व व्यापार संगठन के श्रमिक मानकों के निर्धारण में उन्होंने प्रभावी भूमिका निभायी।

हार्वर्ड विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में डॉक्ट्रेट की उपाधि प्राप्त करने के बाद उन्होंने साइमन कुजनैट्स और पॉल सैमुअल्सन के साथ कई प्रोजेक्ट्स पर शोध कार्य किया और फिर पॉल सैमुअल्सन के साथ संयुक्त लेखक के रूप में इण्डैक्स नम्बर थ्यौरी का एकदम नवीन और पथ प्रदर्शक अध्ययन प्रस्तुत किया।

1905- डा० रामकुमार वर्मा।

इनकी शब्द आज भी मेरे दिलो दिमाग में गूँजता रहता है। आप भी देखिये ऊपर लिखी हुई बाते निचे भी।
जिन्दगी यादों का कारवाँ है.खट्टी मीठी भूली बिसरी यादें...क्यूँ ना उन्हें जिन्दा करें अपने प्रिय गीतों, गजलों और कविताओं के माध्यम से! अगर साहित्य और संगीत की धारा में बहने को तैयार हैं आप तो कीजिए अपनी एक शाम मेरे नाम..
वर्मा जी भारत प्रसिद्ध हिन्दी साहित्यकार में से एक थे,जिनका जन्म हुआ था आज।

आइये एक झलक में उनकी एक कविता देखते है जो मुझे बेहद पसंद है।

शिशिर कणों से लदी हुई, कमली के भीगे हैं सब तार,
चलता है पश्चिम का मारुत, ले कर शीतलता का भार। 

भीग रहा है रजनी का वह, सुंदर कोमल कवरी-भार,
अरुण किरण सम, कर से छू लो, खोलो प्रियतम! खोलो द्वार।

धूल लगी है, पद काँटों से बिंधा हुआ, है दु:ख अपार,
किसी तरह से भूला भटका आ पहुंचा हूँ तेरे द्वार।

डरो न इतना धूल धूसरित ,होगा नहीं तुम्हारा द्वार
धो डाले हैं इनको प्रियवर ,इन आँखों से आँसू ढार

मेरे धूलि लगे पैरों से, इतना करो न घृणा प्रकाश,
मेरे ऐसे धूल कणों से, कब तेरे पद को अवकाश!

पैरों ही से लिपटा लिपटा ,कर लूँगा निज पद निर्धार,
अब तो छोड़ नहीं सकता हूँ, पाकर प्राप्य तुम्हारा द्वार।

सुप्रभात मेरा भी होवे, इस रजनी का दु:ख अपार,
मिट जावे जो तुमको देखूँ, खोलो प्रियतम! खोलो द्वार।।

नमन करते है छायावादी युग के इस महान कवी को और इनकी कविता को।
जय हो मुरलिया वाले।

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