बुधवार, 23 सितंबर 2015

23 सितम्बर का इतिहास दिनकर जी

आज भारत के और बिहार के लाल 'दिनकर’ जी का जन्मदिन है। हम नमन करते है , इस हिन्दी के उच्च-कोटि के यशस्वी कवि हैं को।
दिनकर जी का जन्म 23 सितंबर 1908 को बेगुसराय जिले के सिमरिया घाट में हुआ था, उनका अंतिम समय 24 अप्रैल 1974 को हुआ। ये हिन्दी के एक प्रमुख लेखक, कवि व निबन्धकार थे। वे आधुनिक युग के श्रेष्ठ वीर रस के कवि के रूप में स्थापित हैं।उन्होंने इतिहास, दर्शनशास्त्र और राजनीति विज्ञान की पढ़ाई पटना विश्वविद्यालय से की। उन्होंने संस्कृत, बांग्ला, अंग्रेजी और उर्दू का गहन अध्ययन किया था।
'दिनकर' स्वतन्त्रता पूर्व एक विद्रोही कवि के रूप में स्थापित हुए और स्वतन्त्रता के बाद राष्ट्रकवि के नाम से जाने गये। वे छायावादोत्तर कवियों की पहली पीढ़ी के कवि थे। एक ओर उनकी कविताओ में ओज, विद्रोह, आक्रोश और क्रान्ति की पुकार है तो दूसरी ओर कोमल श्रृंगारिक भावनाओं की अभिव्यक्ति है। इन्हीं दो प्रवृत्तियों का चरम उत्कर्ष हमें उनकी कुरुक्षेत्र और उर्वशी नामक कृतियों में मिलता है।
उर्वशी को भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार जबकि कुरुक्षेत्र को विश्व के 100 सर्वश्रेष्ठ काव्यों में 74वाँ स्थान दिया गया।

23 सितम्बर सन 1932 ईसवी को सउदी अरब देश की स्थापना हुई तथा अब्दुल अज़ीज़ बिन सउद इस देश के नरेश बने। यह देश तीसरी हिजरी शताब्दी अर्थत नवीं ईसवी शताब्दी में अब्बासी शासकों के नियंत्रण से निकल गया और कई शताब्दियों तक वहॉ अशांति रही।
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1976: ब्रितानी नौ सेना के एक युद्धक जहाज़ में घटी दुर्घटना में आठ लोग मारे गए. इंग्लैंड के उतर पूर्व में बने एचएमएस ग्लासगो नाम के यह जहाज़ समुद्र में अपना परीक्षण शुरू करने वाला था.

2002: मोजिला फायर फॉक्‍स का पहला वर्जन लांच हुआ.

1983, कराची से अबू-धाबी जाने वाले यात्री विमान, गल्फ़ एयर-771 में बम धमाका हुआ, जिसके परिणाम स्वरूप चालक दल के सभी पांच कर्मचारी और 107 यात्रियों की मौत हो गई।

1983, दक्षिण अफ़्रीक़ा के गैरी कोयट्ज़ी पहले अफ़्रीक़ी विश्व हेवीवेट चैंपियन बने।

1991, अरमीनिया ने पूर्व सोवियत संघ से अपनी स्वाधीनता की धोषणा की।

1992, यूगोस्लाविया का संयुक्त राष्ट्र संघ से निष्कासन।
2000, सिडनी ओलम्पिक में अमरीका की पूर्व विश्व चैंपियन धाविका एवं बास्केटबाल खिलाड़ी मैरियन जोन्स ने तीन स्वर्ण पदक जीते। लेकिन बाद में डोपिंग की स्वीकारोक्ति के बाद उनसे यह ख़िताब छीन लिया गया।

2001, अमरीका ने भारत व पाकिस्तान पर लगे प्रतिबंध हटाये।

2003, भूटान में लोकतांत्रिक संविधान का मसौदा तैयार हुआ।

2009, भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने भारतीय उपग्रह ओशन सैट-2 समेत सात उपग्रह कक्षा में स्थापित किए।

2011, जेनेवा स्थित भौतिकी की सबसे बड़ी प्रयोगशाला सर्न में जारी प्रयोग ओपेरा में वैज्ञानिकों ने सर्न से 730 किलोमीटर दूर इटली की ग्रैन सासो प्रयोगशाला में भेजे गए उप परमाणविक कण न्यूट्रिनो की गति प्रकाश की गति से भी अधिक पाई।

2011, फ्रांसीसी न्यायालय ने हिंद अहमास और नजाइत अली नाम की दो मुस्लिम महिलाओं को सार्वजनिक जगहों पर हिजाब पहनने के लिए पहली बार सज़ा के रूप में 120 और 80 यूरो का जुर्माना लगाया।

23 सित्म्बर सन 1860 ईसवी को जर्मनी के प्रसिद्ध दार्शनिक आर्थर शोपनहावर का निधन हुआ।

अब चलते चलते कवी दिनकरजी की एक बेहतरीन कविता देखते है जी आज की राजनितिक विचारधारा में एकदम सटीक बैठती है। यह कविता उन्होंने भारत के गणतंत्र दिन के अवसर पर लिखी थी । 26 जनवरी 1951 को भारत ने अपना पहला गणतंत्र दिन मनाया तब दिनकरजी ने यह बेहद सुंदर कविता राष्ट्र को समर्पित की । उस समय भारत की जन्संन्ख्या 33 करोड़ थी, आज हम 125 करोड़ से भी ज्यादा हैं । आज इस भ्रष्टाचार के विरुद्ध  में जब आम नागरिक राष्ट्रहित में रास्ते पर उतर आये हैं, तब यह कविता फिरसे वही रोमांच दिलाती हैं।

सदियों की ठंडी बुझी राख सुगबुगा उठी,
मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती हैं,
दो राह, समय के रथ का घर्घर नाद सुनो,
सिंघासन खाली करो की जनता आती हैं ।

जनता? हाँ, मिट्टी की अबोध मुरते वही,
जाड़े-पाले की कसक सदा सहने वाली,
जब अंग अंग में लगे साँप हो चूस रहे,
तब भी न मुँह खोल दर्द कहने वाली ।

लेकिन, होता भूडोल, बवंडर उठते हैं,
जनता जब कोपकुल हो भृकुटी चढ़ती हैं,
दो राह, समय के रथ का घर्घर नाद सुनो,
सिंघासन खाली करो की जनता आती हैं ।

हुँकारों से महलों की नीव उखड जाती,
साँसों के बल से ताज हम में उड़ता हैं,
जनता की रोके राह समय में ताब कहाँ?
वह जिधर चाहती, काल उधर ही मुड़ता हैं ।

सबसे विरत जनतंत्र जगत का आ पहुँचा,
तैंतीस कोटि-हित सिंघासन तैयार करों,
अभिषेक आज रजा का नहीं, प्रजा का हैं,
तैंतीस कोटि जनता के सिर पर मुकुट धरो ।

आरती लिए तू किसे ढूंढ़ता हैं मुरख,
मंदिरों, राजप्रासादों में, तहखानों में
देवता कही सड़कों पर मिट्टी तोंड रहे,
देवता मिलेंगे खेतों में खलिहानों में ।

फावड़े और हल राजदंड बनाने को हैं,
धूसरता सोने से शृंगार सजाती हैं,
दो राह, समय के रथ का घर्घर नाद सुनो,
सिंघासन खाली करो की जनता आती हैं।

प्रेम से बोलिये जय बाबा फरसा वाले।

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