गुरुवार, 8 अक्टूबर 2015

गौ माता के ऊपर कुछ बाते

आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्। – ‘‘जो व्यवहार अपने प्रति पसन्द नहीं, वह व्यवहार दूसरों के प्रति भी न करें’’ का पालन किया जाए।

कृषि, खनिज, जल, रत्न, पशु एवं उपजाऊ भूमि की प्राकृतिक संपदा से संपन्न भारत की खान-पान संस्कृति सर्वदा वैष्णव रही है। मांस-भक्षकों और तामसी प्रवृत्ति के असुरों से भगवान राम और भगवान कृष्ण के संघर्ष की गाथाएं इसका सहज प्रमाण हैं। भागवत धर्म के अनुसार 70 प्रतिशत देशवासी गाय की पूजा करते हैं और उसे माता के समान सम्मान देते हैं। यूरोपीय देशों, विशेषकर मिस्र में गाय की पूजा होती रही है।

कुरान में खुदा-ए-करीम ने कहा है:
"या अइयोहन्नासो कोलुमिम्मा फिलअर्जेहलालन तइय्यबा।'
ऐ लोगो जिस कदर जमीन से उपजी हलाल (साफ-सुथरी) चीजें हैं, उन्हें शौक से खाओ।
इसका अर्थ है कि इस्लामी आदेश सब्जी खाने पर बल देता है। मांस के लिए "अरबी' शब्द है: "लह्म'। कुरान में "फिल लह्मे हलालन तइय्यबा' (मांस में से साफ-सुथरी चीजें) कहीं नहीं लिखा है। यानी इस्लाम ने मांस खाने के बारे में कहीं कोई स्पष्ट आदेश नहीं दिया है। अब हलाल चीजें या हलाल मांस खाने का अधिकार अगर मुसलमानों को प्राप्त है, तो इसका अर्थ यह नहीं है कि अपने अधिकारों को हर घड़ी जतलाया ही जाए। जिस प्रकार इस्लाम में गाय, बकरी, भैंस, मुर्गा, बटेर, खरगोश, हिरन आदि खाने की छूट है, उसी प्रकार मेहनत करके रोटी खाने का हुक्म भी है। "अक्लेहलाल' यानी "हलाल रोजी', मगर अनेक ऐसे भी हैं, जो दूसरों का अधिकार छीनकर खा रहे हैं। इस्लाम ने इसके अलावा भी बहुत सारे कार्यों का आदेश दिया है, लेकिन क्या तमाम इस्लामी कार्य ईमानदारी से किए जा रहे हैं? यकीनन नहीं! तो फिर गोहत्या के मामले में प्रतिक्रियात्मक जिद का क्या मतलब है? गोहत्या तब प्रतिबंध के हिन्दू आंदोलन की मर्यादा बहाल रखने में मुसलमान आगे आएंगे तो यह नये भारत के निर्माण में सहयोग होगा।

उलेमा-ए-हिन्द (जिसके अध्यक्ष मौलाना असद मदनी हैं) तथा आल इंडिया जमीअत-ए-कुरैश ने भी गोहत्या प्रतिबंधित करने का प्रस्ताव पारित करके सरकार को भेज दिया है।
जिस तरह सूअर के मांस के नाम से मुसलमानों को दु:ख होता है, उसी तरह गोहत्या हिन्दुओं को दु:खी करती है। इसी अहसास के तहत बाबर, हुमायूं, अकबर, शाहजहां, हैदर अली, टीपू सुल्तान, बहादुरशाह जफर, कश्मीर के महाराज जैनुल आबेदीन, नवाब वाजिद अली शाह तक ने गोहत्या को प्रतिबंधित किया था। अंग्रेजों ने इस संदर्भ का लाभ उठाकर दोनों के बीच फूट डालने का काम किया, लेकिन स्वतंत्रता संग्राम के सिपाहियों सर सैयद अहमद खां, मौलाना अबुल कलाम आजाद आदि ने भी हिन्दू भावनाओं की महत्ता को समझते हुए गोहत्या पर प्रतिबंध का समर्थन किया।

पहली बार गोहत्या का आदेश यहूदियों के पैगम्बर मूसा ने उस समय दिया था, जब उनके अनुयायियों ने पैगम्बर की पूजा छोड़कर गाय की पूजा शुरू कर दी थी। इस घटना की चर्चा मूसा के संदर्भ से तौरात, बाइबल और कुरान- तीनों ग्रंथों में दर्ज है। भारत में गोहत्या वस्तुत: इब्राहीम लोदी के काल में शुरू हुई। लोदी वंश के संस्थापक बहलोल लोदी के मरने के बाद उसके बेटे सिकंदर लोदी ने 1489 ई. में जब सत्ता संभाली तो हिन्दुस्थान में मंदिरों के ध्वंस का तीसरा अभियान शुरू हुआ। पहला अभियान महमूद गजनवी और दूसरा मुहम्मद गोरी ने क्रमश: 1024 ई. और 1175 ई. में चलाया था। तीसरे अभियान के एक वर्ष बाद ही सिकंदर लोदी की मौत हो गई और उसके बेटे इब्राहीम लोदी ने पिता के अभियान को आगे बढ़ाते हुए 66,000 हिन्दुओं को गुलाम बनाया और गोमांस बेचने के आदेश दिये।
इसके बाद बाबर का हमला हुआ, जिसने लोदी को परास्त कर 16 सितम्बर 1526 ई. को अपना शासन स्थापित किया। इतिहास में 1526 ई. से 1678 ई. तक (बाबर, हुमायूं और अकबर के शासन तक) गोहत्या के प्रमाण नहीं मिलते। 1679 ई. में औरंगजेब के सत्ता में आने के बाद हिन्दुओं के धर्मान्तरण और गोमांस का प्रचलन शुरू हुआ, जिसका हिन्दुओं ने डटकर विरोध भी किया।
उधर शिवाजी के हाथों अफजल खां के मारे जाने के बाद औरंगजेब ने शाइस्ता खां की कमान में पुन: एक सेना भेजी, जिसने पुणे पर कब्जा कर लिया। कब्जे के बाद शाइस्ता खां ने घोषणा की कि वह शिवाजी को गिरफ्तार करेगा और उन्हें गोमांस खिलाकर मुसलमान बनाएगा। उसी रात शिवाजी ने अचानक हमला कर दिया और शाइस्ता खां भाग गया। (तारीख-ए-अदवार-ए-मुगलिया, पृ. 172, 199, 207, 209, 251 द्वारा कमर आगा खा, लाहौर, 1911 ई.)
...गोहत्या को अंग्रेजी सरकार ने 1891 ई. में कानूनी रूप से वैध ठहराया। ब्रिटिश पूंजी की एक तिहाई हिस्सेदारी से पारसियों ने कानपुर में मांस-निर्यात केन्द्र बनाया, जहां से प्रमुख रूप से गाय और सूअर के मांस का निर्यात
होने लगा।
1892 ई. में "मांस-व्यापार' को ब्रिटिश सरकार ने सार्वजनिक कर दिया और कोलकाता में "मटन-मार्केट' बनाई। यहां से आज भी बकरी, भैंस, बैल, सूअर और गाय आदि कई पशुओं के मांस बाजार में भी जाते हैं और निर्यात भी होता है। कानपुर, सहारनपुर, बिहारशरीफ, केरल और कई उत्तर-पूर्वी राज्यों में गोहत्या आम बात है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद संविधान के अनुच्छेद 48 के तहत पशुधन की वैज्ञानिक व्यवस्था के नाम से राज्यों को पशु हत्या के संदर्भ में जो निर्देश दिए गए हैं, उनमें गाय और बछड़े की विशेष चर्चा करके प्रतिबंधित किया गया है। हिरन, नीलगाय और कबूतर को भी इसी अनुच्छेद के अन्तर्गत सुरक्षा मिली है। कई राज्यों में यह संवैधानिक प्रतिबंध लागू है, लेकिन ज्यादातर राज्यों में या तो प्रतिबंध लागू नहीं है या प्रतिबंध का उपहास उड़ाया जाता है। यह स्थिति निरन्तर
जारी है।
1958 ई. में हनीफ कुरैशी ने सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका दायर करके केन्द्र सरकार से बकरीद के अवसर पर गाय की कुर्बानी की इजाजत मांगी थी, लेकिन न्यायालय ने इस सम्बन्ध में फैसला देते हुए दो प्रमुख बातें कहीं- 1. हिन्दुओं की पवित्र भावना का मान अनिवार्य है। 2. गाय की ही कुर्बानी अनिवार्य कर्तव्य नहीं है, दूसरे जानवरों की कुर्बानी से मजहबी रस्मों को निभाया जा सकता है।
1994 ई. में पश्चिम बंगाल सरकार ने भी केन्द्र सरकार से बकरीद में गाय की कुर्बानी के लिए इजाजत मांगी थी। उस समय भी सर्वोच्च न्यायालय का उपरोक्त फैसला ही सामने आया था।

आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्। – ‘‘जो व्यवहार अपने प्रति पसन्द नहीं, वह व्यवहार दूसरों के प्रति भी न करें’’ का पालन किया जाए।

और ऐसा भी क्यों है कि मुसलमानों का एक वर्ग हिन्दुओं के प्रति विद्वेषभावना से बाबर, हुमायूँ, औरंगजेब जैसे कट्टरपन्थी मुगलों की केवल गन्दी विरासत को ही ढोने और उसके लिये मर मिटने के लिये तैयार रहता है?
यह वर्ग इन शासकों की उन बातों पर कभी ध्यान क्यों नहीं देता, जिनसे भारतीय समाज में सौहार्दभाव को बढ़ावा मिले और शान्ति स्थापित हो सके? इसके ऐतिहासिक प्रमाण हैं कि हिन्दुओं की धार्मिक/सांस्कृतिक भावनाओं के भड़क जाने के भय से बाबर ने न केवल अपने शासन में गोवध पर पाबन्दी लगा रखी थी, बल्कि अपने बेटे हुमायूँ को भी इसको जारी रखने का हुक्म दिया था। अकबर ने भी अपने शासन में गोवध पर पाबन्दी लगा रखी थी। यहाँ तक कि औरंगजेब जैसे कट्टर और परधर्मद्वेषी शासक ने भी गोवध पर मृत्युदण्ड घोषित कर रखा था और इसी परम्परा को आखिरी मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर ने भी जारी रखा था।

जहाँ तक बात है अल्पसंख्यकों के मानवाधिकारों की रक्षा की, तो यह रक्षा यदि बहुसंख्यकों की धार्मिक भावनाओं को आहत करके  होती है तो सर्वथा अनुचित है। और फिर केवल कुछेक व्यक्तियों के मानवाधिकारों की ही बात क्यों हो? क्या बहुसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा नहीं होनी चाहिये? ऐसा भी नहीं है कि राज्य सरकार द्वारा पारित यह नियम केवल अल्पसंख्यकों पर लागू होगा, यह तो सभी पर लागू होगा- ऋषि कपूर जैसे और भी लोग होंगे जो अल्पसंख्यकों की श्रेणी में नहीं आते हैं। उन पर भी लागू होगा। इस तरह की सर्वजन-समभाव की सुविधा गैर-मुस्लिमों को मुगल सल्तनत में कभी नहीं मिली।

इन्हीं अधिकारों की भाषा बोलते-बोलते मुसलमानों का यह वर्ग एक और देश विभाजन हो जाने की धमकी देने लगा है। देश विभाजन होगा या नहीं, इसका जवाब तो समय ही देगा, लेकिन मुसलमानों के भारत में अधिकार की चर्चा के विषय में मैं इस्लामी धर्मशास्त्र, परम्परा, और इतिहास के सर्वश्रेष्ठ विद्वानों में से एक
इस्लामी मौलाना वहीदुद्दीन खान कहते हैं कि मुसलमानों को भारत में जो कुछ मिला है, वह हिन्दू समुदाय की मेहरबानी है और उन्हें इस देश में जो कुछ भी मिला है, उसका उन्हें अधिकार ही नहीं था, इसलिए उन्हें ज्यादा उम्मीद नहीं करनी चाहिए। इस्लामी विद्वान् मौलाना वहीदुद्दीन खान कहते हैं, ‘‘स्वतन्त्रता आंदोलन के दौरान मुसलमानों ने जो बलिदान दिए, उनके बदले उन्हें पाकिस्तान के रूप में एक अलग देश मिल गया और इस तरह उन्होंने अपनी कुर्बानियों को भुना लिया। विभाजन की दलील ही यह थी कि भारत हिन्दू का और पाकिस्तान मुसलमान का, तो फिर अब भारत में उनका अधिकार कैसा? इसके विपरीत हिन्दू समुदाय ने बड़ी बात की है कि आजाद भारत में भी मुसलमानों को बराबरी का दर्जा दे दिया।’’

उपसंहार- इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए केवल मूर्ख व्यक्ति ही ऐसा दुराग्रह करेगा कि चूँकि पहले कुछ लोगों ने ऐसा किया था, इसलिये आज भी ऐसा करना चाहिये। युग बदल गया है, कुछ  आचार-विचार बदल गये हैं और कुछ आचार-विचार समाप्त-प्राय हैं। कुछ परम्पराएँ क्षीण हो गयी हैं, तो कुछ बलवती हो गयी हैं। आधुनिक भारतीय इतिहास को सप्रमाण जानने वाला हर विद्वान् यह मानता है कि पिछले कुछ सौ वर्षों में हुए हिन्दू-मुस्लिम द्वेष और दंगों के पीछे सबसे बड़ा कारण गोहत्या से जुड़ी घटनाओं का होना रहा है।

1857 में हुए स्वतन्त्रता संग्राम के दिल्ली में विफल हो जाने का एक कारण गोहत्या के कारण हिन्दू-मुस्लिम लोगों का बँट जाना भी था, जिसका अंग्रेजों ने पूरा लाभ उठाया। ऐसे में सवाल यह नहीं है कि पहले भारत में क्या होता था और क्या नहीं होता था। सवाल यह है कि आज की असलियत क्या है? आज हिन्दुओं के लिये गौ एक धार्मिक पहचान है और उसकी रक्षा करना धार्मिक कर्तव्य । जबकि गोमांस खाने वाले किसी भी व्यक्ति के लिये न किसी त्यौहार पर और न किसी दूसरे अवसर पर गोमांस खाना धार्मिक या सांस्कृतिक कर्तव्य है। भारत के अन्तिम मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर ने गोहत्या पर पाबन्दी लगाई और गोवध करने वाले को तोप से उड़ा दिये जाने की घोषणा की तो दिल्ली के दो सौ प्रतिष्ठित मुसलमानों ने उनके पास जाकर गुहार लगाई कि ईद के मौके पर उनको गोहत्या करने दी जाए। जफर आग-बबूला हो गये और बोले कि मुसलमान का धर्म गाय की बलि पर निर्भर नहीं है। जैसा पहले कहा गया है, यहाँ तक कि धार्मिक रूप से क्रूर पहचान रखने वाले मुगल बादशाह भी कुछ हद तक हिन्दुओं की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए गोहत्या पर पाबन्दी लगा सकते हैं, तो क्या धर्म-निरपेक्ष भारत में सामाजिक समरसता और शान्ति बनाए रखने के लिये गोवध पर प्रतिबन्ध नहीं लगाया जा सकता है? क्या गोवध पर प्रतिबन्ध के खिलाफ लड़ाई केवल खाने की लड़ाई है या इसके पीछे सामाजिक समरसता को भंग करने वाले कुछ धूर्त हैं? क्या हम भारत में परस्पर वैमनस्य ही फैलाते रहेंगे?

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