जब परशु उठा था परशुराम का,सन्नाटा सा छाया था |
दुष्टो और पापियो का तब तब विनास भी आया था।।
भीष्म जैसे महारथी और कर्ण भी गाथा गाते थे |
प्रहरी बन के श्री राम प्रभु राम में रमैया रमाते थे ||
राम परशु एक शब्द नहीं, शब्दों की परिभाषा है |
भय बिन प्रीत नहीं होती, ये सिद्धान्त समझ में आता है||
हम ऋषियों की संतानें हैं, ऊँचे उठने की ठाने हम, |
अपने पुरखों के कर्मयोग, और शीलयोग्य को पहचाने हम,||
अपना एकत्व परशु जाने, अपना गत गौरव याद करें,|
सुरसरि जहां पर हो हाकिम, तब क्यों फिजूल को पाले हम ||
हे विप्र उठो अँगड़ाई लो, चाणक्य सरिस बन कर आओ,|
ज्ञान ध्यान विज्ञान पढो, दुनिया पर फिर से छा जाओ,||
हमको अंगुलि से बता रहा, विस्तृत पथ वह भृगु नंदन है,|
जो क्रांतिदूत, जमदग्नि पूत, उस ब्राह्मण का अभिनंदन है ||
बाबा फरसा वाले को शत शत नमन
आप सभी भारत वंशियो को अक्षय तृतीया की बहुत बहुत बधाई🙏
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बहुत बहुत धन्यबाद आपका
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