गुरुवार, 12 मई 2016

माँ

आज मातृ दिवस के शुभ अवसर पे सर्वप्रथम धरती माता को दंडवत प्रणाम करते हुए, विश्व की माताओ को साथ ही साथ नमन करते है और दुनिया भर की माँ के लिए मन में आया हुआ शब्द लिख के अपनी निर्मल सी निर्मला माँ के चरणों में समर्पित करते है।

माँ शब्दों की श्रृंखला जैसी, वेदों की है लाइन भी,
माँ राधे की वाणी जैसी, लक्ष्मीबाई की लड़ाई सी,।

माँ ममता की छाव भी है, मधुवन, मिशरी .मलाई सी,
माँ की वाणी धरा गगन है, सुरसरि की निर्मल छाया भी,।

माँ तुलसी आँगन की शोभा, सीता जैसी माई है.
माँ का रूप अलौकिक करता,उनसे पूछो जिनकी माँ न है,।

माँ कवियों की मूल चेतना, वेद, गीता की वाणी है,
रामायण, महाभारत भी ये कहता
महाकाव्य ही माता है,।

माँ अषाढ़ की पहली वर्षा, सावन की पुरवाई-सी
माँ बसन्त की सुरभि जैसी, बगिया की अमराई-सी।

माँ सरस्वती की बिद्या भूमि, लेखन और लाचारी भी,
माँ गैया सी निर्मल पावन, निर्मला माँ है धरती माता भी,।

माँ में श्रद्धा भक्ति जैसी, मीरा की कविताओ सी,
माँ की ममता मानसरोवर, बाबूजी की रखवाली भी,।

माँ धरती है, धरा गगन है, पानी जैसी तरुराइ भी,
माँ की ममता कौन न जाने, माँ तो बारिस की काई भी,।

माँ की ममता का वर्णन न शब्दों का मोहताज है,
माँ की उपमा केवल यही है, माँ मेरी हम सबकी भगवान् है,।

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