आइये एक नजर डालते है आज के इतिहास के बारे में।
सन् 48 ईसा पूर्व- रोम साम्राज्य त्रिकोणीय गठजोड़ के दो महत्वपूर्ण सदस्यों जूल सिज़र और पोम्पस के बीच फ़ारसाल नामक ऐतिहासिक युद्ध इस युद्ध में सिज़र को विजय हुई और पोम्पस मारा गया। इस सफलता के बाद सिज़र रोम के सम्राट बन गये 101 वर्ष पूर्व सिज़र का जन्म हुआ वे युवावस्था में सेना में भर्ती हो गये और धीरे धीरे रोम की सेना के प्रभावशाली कमांडर बन गये। पोम्पस को पराजित करने के बावजूद सिज़र रोम में एक अत्याचारी शासन की स्थापना के अपने प्रयास के दौरान एक राजनैतिक षडयंत्र का शिकार हुए उन्हें रोम की सेनेट के प्रांगड़ में मार दिया गया।
सन् 1923 - एक इतालवी अधिकारी की हत्या के बदले की कार्यवाही में इतालवी नौसेना ने केर्किरा पर अधिकार कर लिया। राष्ट्रसंघ के विरोध करने पर वह 29 सितंबर को उससे अलग हो गया।
सन् 1965 भारत और पाकिस्तान की संयुक्त सीमा पर एक महीने से अधिक समय तक अशांति के बाद भारतीय सेना ने पाकिस्तान पर व्यापक आक्रमण आरंभ किया। दोनों पड़ोसी देशों के बीच कश्मीर मामले को लेकर यह दूसरी लड़ाई थी यह युद्ध लगभग तीन सप्ताह तक चलता रहा और अंतत: सोवियत संघ की मध्यस्थता से थमा। और दोनों ने 10 जनवरी, सन् 1966 से ताजेकिस्तान की राजधानी ताशकंद में सोवियत संघ के तत्कालीन प्रधान मंत्री की मध्यस्थता से वार्ता आरंभ की। वार्ता के समापन पर एक संयुक्त घोषण पत्र जारी हुआ जिसमें कश्मीर समस्या के समाधान और भारत पाक संबंधों के बेहतर बनाने के मार्गों का उल्लेख किया गया था। हालॉकि विश्व के अनेक देशों ने इस घोषणा पत्र का स्वागत किया किंतु यह कश्मीर समस्या का समाधान न कर सका। इस समस्या को लेकर दोनों देशों के बीच अब भी तनाव जारी है।
सन् 1968- दक्षिणी अफ़्रीक़ा में स्वाज़ीलैंड नामक देश ब्रिटेन से स्वतंत्र हुआ। और आज के दिन को इस देश राष्ट्रीय दिवस घोषित किया गया।
6 सितम्बर 1929 को यश जौहर और आज ही के दिन सन् 1971 में देवांग गांधी जो भारतीय क्रिकेट खिलाडी का जन्मदिन है।
दलीप सिंह ये इंसान पंजाब के राजा रणजीत सिंह के सबसे छोटे पुत्र है, इनका जन्म 6 सितम्बर 1838, को लाहोर में हुआ था और मृत्यु: 22 अक्टूबर, 1893, पेरिस में हुआ।
इन्हें 1843 ई. में नाबालिग अवस्था में अपनी माँ रानी ज़िन्दाँ की संरक्षकता में राजसिंहासन पर बैठाया गया।
ये मशहूर है सिक्खो के प्रथम और दुतीय युद्ध इनके ही काल में हुआ था।
दलीप सिंह की सरकार प्रथम सिक्ख युद्ध (1845-46) में शामिल हुई। जिसमें सिक्खों की हार हुई और उसे सतलुज नदी के बायीं ओर का सारा क्षेत्र एवं जलंधर दोआब अंग्रेज़ों को समर्पित करके डेढ़ करोड़ रुपया हर्जाना देकर संधि करने के लिए बाध्य होना पड़ा।
परिषद ने दलीप सिंह की सरकार को 1848 ई. में ब्रिटिश भारतीय सरकार के विरुद्ध दूसरे युद्ध में फँसा दिया। इस बार भी अंग्रेज़ों के हाथों सिक्खों की पराजय हुई और ब्रिटिश विजेताओं ने दलीपसिंह को अपदस्थ करके पंजाब को ब्रिटिश राज्य में मिला लिया। दलीप सिंह की पाँच लाख रुपया वार्षिक पेंशन बाँध दी गई और उसके बाद शीघ्र ही माँ के साथ उसे इंग्लैंण्ड भेज दिया गया, जहाँ दलीप सिंह ने ईसाई धर्म को ग्रहण कर लिया और वह नारकाक में कुछ समय तक ज़मींदार रहा। इंग्लैंण्ड प्रवास के दौरान दलीप सिंह ने 1887 ई. में रूस की यात्रा की और वहाँ पर जार को भारत पर हमला करने के लिए राज़ी करने का असफल प्रयास किया। बाद में वह भारत लौट आया और फिर से अपना पुराना सिक्ख धर्म ग्रहण करके शेष जीवन व्यतीत किया।
अब आइये नमन करते है मेजर धन सिंह थापा की पुण्यतिथि के अवसर पे।
यह नाम किसी सरकारी भाषा का मोहताज नहीं है इनका जन्म: 10 अप्रैल, 1928 और मृत्यु: 6 सितम्बर, 2005) परमवीर चक्र से सम्मानित नेपाली मूल के भारतीय व्यक्ति है। इन्हें यह सम्मान सन 1962 में मिला। 1962 के भारत-चीन युद्ध में जिन चार भारतीय बहादुरों को परमवीर चक्र प्रदान किया गया, उनमें से केवल एक वीर उस युद्ध को झेलकर जीवित रहा उस वीर का नाम धन सिंह थापा था जो 1/8 गोरखा राइफल्स से, बतौर मेजर इस लड़ाई में शामिल हुआ था। धन सिंह थापा भले ही चीन की बर्बर सेना का सामना करने के बाद आज भी जीवित रहे,लेकिन युद्ध के बाद चीन के पास बन्दी के रूप में जो यातना उन्होंने झेली उसकी स्मृति भर भी थरथरा देने वाली है। धन सिंह थापा इस युद्ध में पान गौंग त्सो (झील) के तट पर सिरी जाप मोर्चे पर तैनात थे, जहाँ उनके पराक्रम ने उन्हें परमवीर चक्र के सम्मान का अधिकारी बनाया।
शास्त्रीय संगीत के पिता के पिता और पितामह कहे जाने वाले सच्चे देश भक्त और भारत माँ की शान अलाउद्दीन ख़ाँ को गंगा मणि दीक्षित के तरफ से नमन इनका जन्म: सन 1881 और मृत्यु: 6 सितम्बर, 1972) ये सरोद वादक थे और उन्होंने भारतीय संगीत के सबसे बड़े घरानों में से एक मैहर घराने की भी नींव रखी थी। अलाउद्दीन ख़ाँ को सन 1958 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था। उस्ताद अली अकबर ख़ाँ भारत में शास्त्रीय संगीत परंपरा के पितामह कहे जाने वाले बाबा अलाउद्दीन ख़ाँ साहेब के बेटे हैं, उन्हीं के संरक्षण में मैहर घराने की विरासत संभालते हुए अली अकबर ख़ान ने अपने पिता से संगीत सीखा। अलाउद्दीन ख़ाँ ने पंडित रविशंकर और अल्ला रक्खा ख़ाँ को भी शास्त्रीय संगीत सिखाया था। इन्होंने संगीत को देश के बाहर पूरी दुनिया में प्रचार-प्रसार करने का काम किया था।
अब प्रेम से बोलिये जय जय श्री राधे
और हाँ एक बात और-
आप लोग ये लिंक जरूर खोल के देखे क्यू की नवरात्री का पावन पर्व आने वाला है शायद ये वीडियो आपके काम में आ जाये।
http://youtu.be/UtN0jdmjFTg
और प्रेम से बोले जय बाबा फरसा वाले की।
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